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- दैवीय प्रेम
दैवीय प्रेम कोई आकर्षण नहीं होता बल्कि समर्पण की वो अवस्था है जहाँ “पाने” की कोई इच्छा शेष नहीं रहती जिसे मिलते ही जीवन अपने आप पूर्ण हो जाए जहाँ किसी शर्त, किसी अपेक्षा किसी अधिकार की भाषा ही शेष न बचे -- वही प्रेम दैवीय होता है -- दैवीय प्रेम मे हाथ थामना आवश्यक नही -- निकटता का प्रदर्शन भी आवश्यक नही बल्कि यहाँ तो अनुपस्थिति भी एक पूर्ण उपस्थिति बन जाती है!- ____ ये वो प्रेम है जहाँ आत्मा आत्मा को पहचान लेती है बिना परिचय, बिना स्पर्श,बिना ये पूछे कि “तुम मेरे क्या हो?” दैवीय प्रेम आवाज़ नहीं करता शोर नहीं मचाता ये प्रेम तो चुप्पी की गोद में बैठकर मन के सबसे कोमल हिस्से को सहलाता है-- ये प्रेम दर्द से डरता नही बल्कि दर्द को प्रसाद की तरह स्वीकार कर लेता है क्योंकि दैवीय प्रेम जानता है -- जो भीतर तक तोड़ दे वही भीतर तक गढ़ने की क्षमता भी रखता है!- _____ जहाँ सांस रुक-रुक कर चलती हैजहाँ स्मृतियाँ चुभती है जहाँ कोई नाम लिए बिना आँखें भर आती है वहीं कहीं दैवीय प्रेम मौन रूप से उपस्थित होता है वो प्रेम जो तुम्हें बेहतर इंसान बना दे जो तुम्हारे भीतर क्षमा, धैर्य और मौन का दीप जला दे जो तुम्हें किसी को पकड़कर रखने के बजाय उसे मुक्त करना सिखा दे -- वही दैवीय प्रेम है!- ______ दैवीय प्रेम मे ईर्ष्या नहीं होती अधिकार नहीं होता बस एक गहरी प्रार्थना होती है -- “जहाँ भी रहो जैसे भी रहो, पूर्ण रहो" ये प्रेम कभी बाँधता नही कभी थकाता नहीं, कभी कम नहीं पड़ता-- ये प्रेम कभी शिकायत नहीं करता कि “मैंने तुम्हारे लिए क्या-क्या किया” क्योंकि दैवीय प्रेम कर्म करता है हिसाब नही और हाँ, दैवीय प्रेम हर किसी के हिस्से नहीं आता- ये वही लोग समझ पाते हैं जो टूटकर भी कड़वे नहीं हुए जो छले जाकर भी करुणा बचाए रख पाए जो प्रेम खोकर भी प्रेम को दोषी नहीं ठहराते!- _____ दैवीय प्रेम उन्हीं हृदयों में उतरता है जो घावों के बावजूद प्रेम करना नहीं छोड़ते -- अंत में बस इतना ही लिखना है की जिस प्रेम मे अहंकार गल जाए जिस प्रेम में “मैं” विसर्जित हो जाए जिस प्रेम मे तुम किसी को पाकर नहीं खुद को खोकर पा लो -- समझ लेना,वो प्रेम मनुष्य का नही बल्कि दैवीय प्रेम है!- #Divine_love
- प्रेम और इच्छा का अंतर
गाँव के बाहर एक पुराना बरगद था,जहाँ लोग अक्सर जीवन की उलझनों पर बात करने आते थे।वहीं एक दिन एक युवक बैठा था—मन में बेचैनी, आँखों में भ्रम। वृद्ध साधक ने उसे देखा और कहा,“तुम्हारी उलझन प्रेम की नहीं,इच्छा की है।” युवक चुप रहा। साधक बोले—“यदि कभी किसी स्त्री की देह चाहिए हो,तो साहस रखो और सच्चे रहो।बिना लाग-लपेट के,विनम्रता से अपनी बात कहो।यदि वह स्वीकार करे,तो उसे अनुग्रह समझो।और यदि अस्वीकार करे,तो उसकी इच्छा का सम्मान करवहीं से लौट जाओ—जहाँ से आए थे।” फिर उन्होंने ठहरकर कहा—“लेकिन कभी अपनी कामना कोप्रेम का नाम देकर मत परोसना।इच्छा को प्रेम के आवरण में लपेटनासबसे बड़ा छल है।” युवक ने सिर झुका लिया। “हाँ,” साधक आगे बोले,“ऐसा करके शायद तुम देह पा लो,लेकिन साथ मेंएक ऐसी आत्मा भी तुम्हारे साथ आएगीजो तुम्हारे प्रेम पर विश्वास कर बैठी होगी।और जब तुम्हारी ज़रूरत पूरी हो जाएगी,तो वह आत्मा टूट जाएगी—निर्दोष, असहाय, और ठुकराई हुई।” “उस टूटन का बोझ,”साधक की आवाज़ गहरी हो गई,“तुम उम्र भर अपने भीतर ढोओगे।” युवक की आँखें भर आईं।उसे पहली बार समझ आया—प्रेम अधिकार नहीं होता,ज़िम्मेदारी होता है।और इच्छा का सम्मान तभी हैजब उसमें सच्चाई और सहमति हो। वह बरगद के नीचे से उठा,पहले से हल्का,पहले से बेहतर इंसान बनकर—क्योंकि उसने सीख लिया थाकि देह पाने से बड़ा मूल्यआत्मा को आहत न करने का होता है। जो कभी चाहिए हो किसी स्त्री की देह तो बिना किसी लागलपेट के सीधे जाकर उससे विनम्रता से याचना कर लेना। याचना स्वीकार हो जाये तो अनुग्रह मानना , न स्वीकार हो तो उसकी इच्छा का सम्मान करते हुए लौट जाना,जहाँ से आये थे। लेकिन जो कभी चाहिए स्त्री की देह तो प्रेम के रास्ते पर मत चलकर जाना, अपनी कामना को प्रेम के आवरण में लपेटकर मत प्रस्तुत करना। ऐसा करके देह तो अवश्य ही पा लोगे लेकिन साथ में देह के भीतर तुम्हारे प्रेम में डूबी उस स्त्री की आत्मा भी आएगी जिसकी तुम्हें ज़रूरत नही होगी और उस ठुकराई हुई निर्दोष आत्मा के गुनहगार तुम ता-उम्र रहोगे।
- Love Of OverThinker
"ओवरथिंकर" जैसे लोग हर शब्द बोलने से पहले दर्ज़नों अर्थों में उसे तोड़ते-जोड़ते है-- हर ख़ामोशी को अपराध मानकर ख़ुद से पूछताछ करते है-- ओवरथिंकर प्रेम में इसलिए गहरे उतरते है क्युँकि उन्हें पता होता है- अनकहा क्या चोट पहुँचा सकता है- वे अपने भीतर ही हज़ारों संवाद कर लेते है ताकि सामने वाला एक भी असहज पल से न गुज़रे!- _____ वे प्राथमिकता देते है पर दिखावे में नही बल्कि अपने हिस्से की नींद अपनी शांति अपने प्रश्न सब चुपचाप स्थगित कर देते है-- ओवरथिंकर पहले ख़ुद को समझाते हैं-- “शायद उसकी मजबूरी होगी”,“शायद मेरा सोचना ज़्यादा है”,“शायद प्रेम यही है-- ख़ुद को पीछे रख देना” इसलिए वे सबसे ज़्यादा थकते है सबसे कम शिकायत करते है और टूटने पर भी टूटने की आवाज़ नहीं आने देते!- ______ उनका प्रेम सुरक्षित होता है पर वे स्वयं असुरक्षित हो जाते है- वे रिश्ते बचाते-बचाते ख़ुद को खो देते है-- ओवरथिंकर बेस्ट प्रेम निभाते है क्युँकि वे प्रेम को अधिकार नही ज़िम्मेदारी मानते है-- और हर ज़िम्मेदारी की क़ीमत वे अपने भीतर चुकाते है पर विडंबना देखो— जो सबसे ज़्यादा सोचकर प्रेम करता है उसी से कहा जाता है-- “तुम ज़्यादा सोचते हो”और वो मुस्कुरा देता है, क्युँकि उसने इस उत्तर की भी पहले ही तैयारी कर रखी होती है!- _______ अंत मे कहूं कुछ -- "मै खुद एक ओवरथिंकर ही हूँ "!- लेकिन मुझे इस शब्द से नफ़रत नहीं होती है बल्कि प्रेम होता है --- “ओवरथिंकर” वह उन लोगों में से था जो हर शब्द बोलने से पहलेउसे दर्ज़नों अर्थों में तोड़कर, जोड़कर देखते थे।किसी की ख़ामोशी भी उसे बेवजह की नहीं लगती थी—वह उसे अपराध मानकरख़ुद से पूछताछ करता रहता,“कहीं मैंने कुछ गलत तो नहीं कह दिया?” वह प्रेम में गहरे उतरता था,क्योंकि उसे पता था—अनकहा शब्द सबसे ज़्यादा चोट पहुँचा सकता है।इसलिए वह अपने भीतरहज़ारों संवाद कर लेता,ताकि सामने वालाएक भी असहज पल से न गुज़रे। वह प्राथमिकता देता था,लेकिन दिखावे में नहीं।अपने हिस्से की नींद,अपनी शांति,अपने सवाल—सब चुपचाप स्थगित कर देता।पहले ख़ुद को समझाता,“शायद उसकी मजबूरी होगी,”“शायद मेरा सोचना ज़्यादा है,”“शायद प्रेम यही है—ख़ुद को थोड़ा पीछे रख देना।” इसीलिए वह सबसे ज़्यादा थकता,सबसे कम शिकायत करता।और जब टूटता,तो टूटने की आवाज़ तकबाहर नहीं आने देता। उसका प्रेम सुरक्षित होता था,लेकिन वह स्वयं असुरक्षित हो जाता।रिश्तों को बचाते-बचातेकभी-कभी ख़ुद को खो देता।वह प्रेम को अधिकार नहीं,ज़िम्मेदारी मानता था—और हर ज़िम्मेदारी की क़ीमतअपने भीतर चुकाता था। विडंबना देखो—जो सबसे ज़्यादा सोचकर प्रेम करता है,उसी से कहा जाता है,“तुम ज़्यादा सोचते हो।”वह मुस्कुरा देता…क्योंकि इस उत्तर की भीतैयारी वह पहले ही कर चुका होता है। अंत में बस इतना—वह ख़ुद एक ओवरथिंकर था।और इस शब्द से उसे नफ़रत नहीं,बल्कि एक अजीब-सागहरा प्रेम था।
- एक विषैले व्यक्ति
न तो साथ चाहिए, न तुम्हें आज़ाद छोड़ेंगे": एक विषैले व्यक्ति" हम सभी ने जीवन में कभी न कभी ऐसे लोगों का सामना किया है जो न तो हमारे साथ एक सच्चा और स्वस्थ रिश्ता रखना चाहते हैं, और न ही हमें पूरी तरह आज़ाद छोड़ना चाहते हैं। ऐसे लोग अपने नियंत्रण, हस्तक्षेप और मानसिक चालबाज़ियों से न केवल रिश्तों को जटिल बनाते हैं, बल्कि दूसरे व्यक्ति की पहचान और आत्मसम्मान को भी धूमिल कर देते हैं। ये लोग अक्सर "Toxic", यानी विषैले व्यवहार के उदाहरण होते हैं, और उनके व्यवहार में गैसलाइटिंग, इमोशनल मैनिपुलेशन, कंट्रोलिंग टेंडेंसी, और नार्सिसिज़्म की झलक मिलती है। आइए ऐसे व्यक्तित्वों और उनके व्यवहार की मनोवैज्ञानिक परतों को समझते हैं। 1. संबंध की दोहरी मानसिकता: न तुम्हारा, न किसी और का इस तरह के लोग एक विरोधाभासी मानसिकता में जीते हैं। वे किसी को अपने जीवन में पूरी तरह शामिल नहीं करना चाहते, लेकिन जब वही व्यक्ति अपनी राह पर आगे बढ़ता है या स्वतंत्रता की कोशिश करता है, तो वे बेचैन हो उठते हैं। यह व्यवहार अक्सर इनसिक्योरिटी, ईगो थ्रेट, और अटैचमेंट डिसऑर्डर से जुड़ा होता है। उदाहरण: एक व्यक्ति अपनी पार्टनर के साथ भावनात्मक रूप से जुड़ा नहीं है, बात करने से कतराता है, पर जब वही पार्टनर किसी और से भावनात्मक सहारा लेने लगती है, तो वह व्यक्ति अचानक ईर्ष्या और अधिकार की भावना में आ जाता है। 2. हर बात में हस्तक्षेप: "मैं तुम्हारे हर निर्णय में रहूँगा" ऐसे लोग किसी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता, पसंद-नापसंद या निर्णयों को सम्मान नहीं देते। उन्हें हर बात में टांग अड़ाने की आदत होती है चाहे वह कपड़े पहनने का स्टाइल हो, करियर का चुनाव, या दोस्ती के दायरे। यह व्यवहार कंट्रोलिंग बिहेवियर कहलाता है, जिसका मनोवैज्ञानिक कारण अक्सर खुद पर नियंत्रण की कमी होती है। जब व्यक्ति अपने जीवन पर नियंत्रण खो बैठता है, तो वह दूसरों के जीवन पर नियंत्रण पाकर खुद को ताकतवर महसूस करता है। 3. गैसलाइटिंग: "तुम ही पागल हो, मैं तो सही हूँ" Gaslighting एक मनोवैज्ञानिक शोषण की प्रक्रिया है जिसमें सामने वाले व्यक्ति की सोचने-समझने की शक्ति पर सवाल खड़े किए जाते हैं, ताकि वह अपने निर्णयों और भावनाओं पर भरोसा खो दे। गैसलाइटिंग के उदाहरण: "तुम हमेशा ज़रूरत से ज़्यादा रिएक्ट करती हो।" "तुम्हें याद ही नहीं रहता, मैंने ऐसा कभी कहा ही नहीं।" "तुम्हारा दिमाग खराब है, हर बात में तुम ही गलत हो।" यह तकनीक व्यक्ति को संदेह, शर्म और आत्म-अविश्वास में डुबो देती है, जिससे वह भावनात्मक रूप से पराधीन हो जाता है। 4. विषैले संबंधों का चक्र: लूप जो टूटता नहीं Toxic संबंध अक्सर एक चक्र में चलते हैं: लुभावनापन (Idealization): शुरुआत में बहुत प्यार, प्रशंसा और आकर्षण दिखाया जाता है। कमज़ोरी निकालना (Devaluation): धीरे-धीरे आलोचना, उपेक्षा और दोषारोपण शुरू होता है। त्याग देना (Discard): जब व्यक्ति टूट जाता है, तो उसे "बेकार" समझकर छोड़ दिया जाता है। वापसी (Hoovering): और जब वह व्यक्ति थोड़ा संभलता है, तो उसे फिर से वापस खींचने की कोशिश की जाती है। यह चक्र बार-बार दोहराया जाता है और पीड़ित व्यक्ति धीरे-धीरे अपनी पहचान खो देता है। 5. मनोवैज्ञानिक जड़ें: ये लोग ऐसे क्यों होते हैं? "विषैले व्यवहार जन्म से नहीं आते, वे अक्सर अनसुलझे आघात, बचपन के अनुभव, और मनोवैज्ञानिक असुरक्षा से उपजते हैं।" संभावित कारण: बचपन में भावनात्मक उपेक्षा या दुराचार खुद के प्रति आत्म-घृणा या आत्म-संदेह नार्सिसिस्टिक पर्सनालिटी डिसऑर्डर (NPD) बॉर्डरलाइन पर्सनालिटी डिसऑर्डर (BPD) इनमें से कई लोगों को स्वयं भी यह नहीं पता होता कि वे दूसरों को कितना नुकसान पहुँचा रहे हैं। 6. इससे कैसे बचा जाए? सीमाएं तय करें :- स्पष्ट रूप से बता दें कि आप क्या बर्दाश्त करेंगे और क्या नहीं। गैसलाइटिंग को पहचानें: अपनी सच्चाई पर भरोसा करें। अपनी भावनाओं को खुद से वैध मानें। सहायता लें: काउंसलिंग, थेरेपी या समर्थन समूह से जुड़ना मददगार हो सकता है। डिटैचमेंट की कला सीखें: हर संघर्ष को जीतना ज़रूरी नहीं होता। कभी-कभी हार मानकर दूर जाना ही असली जीत होती है। आज़ादी की कीमत ऐसे लोग जो न साथ निभा पाते हैं, न ही छोड़ पाते हैं वे असल में खुद अपने ही भीतर कन्फ्लिक्ट से जूझ रहे होते हैं। लेकिन उनका यह संघर्ष दूसरों को नष्ट कर सकता है। इसलिए सबसे बड़ी जिम्मेदारी हमारी है स्वयं को बचाना, अपने आत्म-सम्मान को सुरक्षित रखना, और अपने जीवन का नियंत्रण वापस लेना। "जो तुम्हारे साथ होना ही नहीं चाहता, वह तुम्हें कंट्रोल क्यों करे? जवाब है ताकत, ईगो और डर। लेकिन तुम्हारा जवाब होना चाहिए 'नहीं।'"
- बात करने से पहले – एक आत्मचिंतन की आवश्यकता"
हम अक्सर किसी बातचीत में जल्दी से प्रतिक्रिया दे बैठते हैं अपनी सोच, अपने अनुभव, या अपने दृष्टिकोण के आधार पर। परंतु हर मनुष्य एक संपूर्ण ब्रह्मांड है, जिसकी अपनी जटिलता, अपनी पीड़ा, आशाएँ, विश्वास, डर और संवेदनाएँ होती हैं। इसलिए, कुछ कहने या जवाब देने से पहले स्वयं में एक बार ठहरकर आत्मचिंतन करना ज़रूरी होता है। शब्द केवल ध्वनियाँ नहीं होते; वे असर डालते हैं कभी सान्त्वना बनते हैं, कभी चोट। हर व्यक्ति की अपनी 'दुनिया' होती है हम यह मानकर चलते हैं कि सामने वाला हमें उसी तरह समझेगा जैसे हम खुद को समझते हैं, पर यह एक भ्रम है। हर इंसान की एक "भीतर की दुनिया" होती है जहाँ उसका अतीत, उसके अनुभव, उसके संघर्ष, और उसके अदृश्य घाव रहते हैं। वह किस स्थिति से गुज़र रहा है यह बाहर से नहीं दिखता। हो सकता है कि वह व्यक्ति उस वक़्त मानसिक अशांति से जूझ रहा हो, कोई पीड़ा उसके हृदय में गूंज रही हो, कोई पुराना ज़ख़्म फिर से हरा हो गया हो और ऐसे समय में, चाहे हमारा जवाब कितना भी "सही" क्यों न हो, वह असमय और असंवेदनशील प्रतीत हो सकता है। स्थिति की संवेदनशीलता को समझना आवश्यक है तथ्य और तर्क महत्वपूर्ण हैं, लेकिन संवेदनशीलता और स्थिति-बोध उससे भी अधिक। हर बात का एक "समय" होता है, और हर व्यक्ति की सुनने की क्षमता और आंतरिक स्थिति हर समय एक जैसी नहीं होती। हमें यह समझने की ज़रूरत है कि: क्या सामने वाला अभी सुनने की स्थिति में है? क्या वह खुले मन से कुछ ग्रहण कर सकता है? क्या मेरा उत्तर इस समय उसकी भावनाओं को ठेस पहुँचा सकता है? यदि नहीं, तो हो सकता है कि हमारा "सही" जवाब भी एक गलत वार्तालाप को जन्म दे दे। दूसरे की भावनात्मक संरचना को समझें किसी से संवाद करने से पहले, अगर हम यह प्रयास करें कि हम उसके: मूल्य विश्वास डर संवेदनाएँ भावनात्मक घाव को थोड़ी गहराई से समझें, तो हमारी बातें सिर्फ शब्द नहीं रह जाएँगी, वे संबंध बन जाएँगी। यह समझना केवल दूसरों के लिए नहीं, अपने लिए भी जरूरी है क्योंकि जब हम समझदारी और संवेदनशीलता से संवाद करते हैं, तब संघर्षों से नहीं, बल्कि संपर्कों से रास्ते खुलते हैं। बात करना सरल है, सही तरीके से सही समय पर बात करना कला है। और यह कला अभ्यास, आत्म-चिंतन और करुणा से ही आती है। इसलिए अगली बार जब आप किसी को जवाब देने जाएँ पहले ठहरिए। सोचिए। महसूस कीजिए। हो सकता है, उस एक पल की चुप्पी आपकी बातों को और अधिक प्रभावशाली, और रिश्तों को और अधिक गहराई दे जाए।
- धीरे-धीरे सूखती औरत
धीरे-धीरे सूखती है एक औरत, जैसे रात में किसी बगीचे का फूल जिसे किसी ने तोड़ा नहीं, मगर नमी चुरा ली हो हवा ने। वो सूखती है जब सुबह की चाय बनाते वक़्त कोई "थैंक यू" नहीं कहता, जब थाली में परोसी रोटियों के स्वाद पर चेहरे सिकुड़ते हैं, मगर उसकी मेहनत कोई नहीं देखता। वो सूखती है जब अपनी बात को बीच में रोक देना उसकी आदत बन जाती है, क्योंकि कोई सुनता नहीं, या सुनकर भी समझता नहीं। वो सूखती है जब उसकी पसंदें "गृहस्थी के तवे" में जल कर राख हो जाती हैं। नीली साड़ी जो उसे बहुत पसंद थी, वो अब अलमारी के कोने में है क्योंकि अब उसे "शोभा नहीं देती।" सूखना कोई अचानक घटना नहीं होती। ये एक अनदेखा युद्ध है हर दिन, हर पल, हर रिश्ते में थोड़ा-थोड़ा मरना, बिना तेरहवीं, बिना शोक, बिना किसी को खबर हुए। वो सूखती है जब हँसी एक सामाजिक अभिनय बन जाती है, जब "मैं ठीक हूँ" एक नकाब बन जाता है जिसके नीचे आँखों में नींद नहीं, बल्कि अनकहे सपनों की भीड़ होती है। वो सूखती है जब "अपने लिए कुछ करना" एक अपराध लगता है, जब उसे सिखा दिया गया होता है कि पहले बच्चे, पति, परिवार... और सबसे अंत में कहीं उसका नाम आता है अगर आता है। फिर भी... वो चुप रहती है। क्योंकि उसे सिखाया गया है "अच्छी औरतें बर्दाश्त करती हैं," "शिकायत करना स्वार्थ होता है," "त्याग ही उसका गहना है।" और इस 'त्याग' की माला में वो खुद को मोती की तरह पीसती है, हर दिन थोड़ा और धुंधली होती जाती है, जैसे पुराने तस्वीरों की मुस्कान। सूखना सिर्फ पानी की कमी नहीं होती, ये उस प्यार की कमी होती है जो सिर्फ "लेता" है, "देता" नहीं। ये उस स्पर्श की कमी होती है जो सिर्फ ज़िम्मेदारी निभाता है, मगर आत्मा को नहीं छूता। ये उस संवाद की कमी होती है जहाँ वो बिना डरे, खुद के बारे में बोल सके जैसी वो है, वैसी। और जब वो पूरी तरह सूख जाती है, तो पेड़ की तरह गिरती नहीं बल्कि एक लकड़ी बन जाती है किसी के चूल्हे में जलने के लिए, किसी की ठंड हरने के लिए, या किसी के सपनों की नाव बनाने के लिए। क्योंकि वो औरत है मरती भी है तो किसी के लिए। सूखती भी है तो किसी की राहत बनकर। और हर बार, अपने अस्तित्व को मिटाकर किसी और की कहानी का आधार रखती है। इस सूखने की आहट कोई नहीं सुनता, क्योंकि औरत हमेशा बोलती नहीं वो बस जीती है, सहती है, और अंत में चुपचाप बदल जाती है।
- क्या मानव को खुश रहने के लिए तामझाम ज़रूरी हैं?
यह प्रश्न जितना सरल प्रतीत होता है, उतना ही जटिल इसका उत्तर है। यदि आदर्श की बात करें तो शायद उत्तर “नहीं” होना चाहिए, परंतु यदि वर्तमान समाज और आज के यथार्थ को देखें, तो इस सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता कि आज के समय में खुश रहने के लिए तामझाम को लगभग अनिवार्य बना दिया गया है। आज मानव जीवन की लगभग 98% समस्याओं का केंद्र बिंदु पैसा बन चुका है। चाहे वह सम्मान हो, सुरक्षा हो, शिक्षा हो या स्वास्थ्य हर समस्या का समाधान धन से जोड़कर देखा जाता है। यह स्थिति यूँ ही नहीं बनी, बल्कि समाज की सामूहिक मानसिकता ने इसे जन्म दिया है। पैसा और सम्मान का नया समीकरण आज की दुनिया में अधिकांश लोग पहले यह नहीं पूछते कि कोई व्यक्ति कैसा है, बल्कि यह पूछते हैं कि उसके पास कितना है। जिसके पास जितना अधिक धन, समाज में उसका स्थान उतना ऊँचा। सम्मान अब चरित्र, ज्ञान या संवेदनशीलता से नहीं, बल्कि बैंक बैलेंस से मापा जाने लगा है। यही कारण है कि लोग पैसों को साधन नहीं, बल्कि अंतिम लक्ष्य मान बैठे हैं। हर समस्या का समाधान सिर्फ पैसा? मानव आज इस भ्रम में जी रहा है कि हर समस्या का हल पैसे से खरीदा जा सकता है। बेहतर इलाज चाहिए:- महँगा अस्पताल बच्चों का भविष्य सुरक्षित चाहिए :- महँगी स्कूलिंग मानसिक शांति चाहिए :-महँगे कोर्स, रिट्रीट और गुरु यहाँ तक कि ध्यान और आत्मिक शांति, जो कभी मनुष्य की सबसे सहज और प्राकृतिक क्षमता थी, उसे भी बाज़ार में बेचने की वस्तु बना दिया गया है। ध्यान: जो कभी प्रकृति था, आज उत्पाद है ध्यान तो उतना ही प्राकृतिक है जितनी हवा, पानी और साँस। यह मनुष्य को बाहर से नहीं, अंदर की ओर ले जाने की प्रक्रिया है। पर आज स्थिति यह है कि लोग ध्यान सीखने के लिए करोड़ों खर्च करने को तैयार हैं जैसे शांति भी कोई लक्ज़री प्रोडक्ट हो। आज “ध्यान” भी पैकेज में बिकता है वीआईपी ध्यान, स्पेशल ध्यान, एक्सक्लूसिव शांति। यही तो है “जैसा राजा, वैसी प्रजा” जहाँ पैसा है, वहाँ विशेष अधिकार हैं। बाज़ार बनाम आत्मा समस्या पैसा होने में नहीं है, समस्या यह है कि हमने हर अनुभव को बाज़ार के हवाले कर दिया है। जहाँ आत्मा की यात्रा होनी थी, वहाँ विज्ञापन पहुँच गया। जहाँ मौन होना था, वहाँ शोर बिकने लगा। मनुष्य बाहरी सुविधाओं में इतना उलझ गया है कि उसने भीतर झाँकना ही छोड़ दिया। और जब भीतर खालीपन महसूस होता है, तो वह उसे भरने के लिए फिर बाहर की चीज़ें खरीदता है एक अंतहीन चक्र। वास्तविक खुशी कहाँ है? सच यह है कि तामझाम सुविधा दे सकता है, सुरक्षा दे सकता है, पर स्थायी खुशी नहीं। खुशी तब आती है जब मनुष्य अपनी आवश्यकताओं को समझे तुलना करना छोड़े और यह स्वीकार करे कि कुछ चीज़ें खरीदी नहीं जा सकतीं ध्यान, शांति, संतोष ये सब अंदर से उगते हैं, बाहर से नहीं लाए जाते। आज के समय में यह कहना गलत नहीं होगा कि समाज ने खुश रहने के लिए तामझाम को आवश्यक बना दिया है। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि यह आवश्यकता प्राकृतिक नहीं, कृत्रिम है। जब तक मनुष्य पैसा को साधन की जगह साध्य मानता रहेगा, तब तक वह बाहर सब कुछ पाकर भी भीतर से खाली ही रहेगा। और जिस दिन वह यह समझ लेगा कि असली समृद्धि भीतर है, उस दिन तामझाम अपने आप अनावश्यक हो जाएगा।
- ज़िक्र से नहीं.!फ़िक्र से पता चलता है, कि अपना कौन है..!!
दुनिया में बहुत लोग हैं जो हमारे सामने बैठकर बातें तो खूब करते हैं, हमारा ज़िक्र महफ़िलों में भी होता है, लेकिन जब हालात मुश्किल हो, तो वही चेहरे ग़ायब नज़र आते हैं। असल अपने वो नहीं जो हर बार नाम लेते हैं, बल्कि वो हैं जो बिना कहे हाल जान लेते हैं, जो दूर रहकर भी आपकी फ़िक्र करते हैं। ज़िक्र तो दिखावा भी हो सकता है, लेकिन फ़िक्र... वो तो दिल की सच्चाई से निकलती है। इसलिए जब भी अपने और पराए में फर्क समझ न आए, तो ये मत देखो कौन तुम्हारा नाम ले रहा है — देखो कौन तुम्हारे लिए रात को चैन से सो नहीं पा रहा। ज़िक्र से नहीं.! फ़िक्र से पता चलता है, कि अपना कौन है..!! "जो हर रोज़ नाम ले, ज़रूरी नहीं कि वो अपना हो,जो चुपचाप दुआ करे, वही असली रिश्ता होता है।" "ज़िक्र तो सभी कर लेते हैं वक्त बिताने के लिए,फ़िक्र वही करता है जो दिल से जुड़ा होता है।" "अपनों की पहचान आवाज़ से नहीं,चुपचाप किए गए एहसास से होती है।" "कौन कितना याद करता है, ये मायने नहीं रखता,कौन कितनी फ़िक्र करता है, बस यही काफ़ी है।" "ज़ुबान से किया गया ज़िक्र आसान होता है,दिल से की गई फ़िक्र बहुत मुश्किल।" "हर कोई कहता है – 'हम साथ हैं',मगर फ़िक्र करने वाले कुछ ही होते हैं।" "जो बिना दिखाए साथ निभाए,वही रिश्ता सबसे सच्चा होता है।"
- अकेले ही जीवन में आगे बढ़कर बताऊंगा तुम्हे की.!
"अकेले ही जीवन में आगे बढ़कर बताऊंगा तुम्हें कि...बुजदिल औरतों के छोड़ जाने से मर्द मरा नहीं करते..!!" कभी-कभी ज़िंदगी में ऐसा भी मोड़ आता है जब अपनों का साथ छूटता है, और दर्द की आँच में इंसान खुद को अकेला पाता है। मगर वही अकेलापन अगर हौसले में बदल जाए, तो वही टूटापन ताक़त बन जाता है। जिस औरत ने मुश्किल वक्त में साथ छोड़ दिया, उसने शायद मुझमें सिर्फ कमज़ोरी देखी — मगर अब वही अकेलापन मेरी सबसे बड़ी प्रेरणा बनेगा। मैं उठूंगा, चलूंगा, और इतनी ऊँचाई तक जाऊंगा कि एक दिन यही दुनिया देखेगी — मर्द सिर्फ मोहब्बत के सहारे नहीं, अपने हौसलों से जीते हैं। छोड़ जाने वालों का शुक्रिया, क्योंकि उन्होंने ही सिखाया कि असली मज़ा अकेले जीतने में है। अकेले ही जीवन में आगे बढ़कर बताऊंगा तुम्हे की.! बुजदिल औरतों के छोड़ जाने से मर्द मरा नहीं करते..!! "जिसने साथ छोड़ दिया,उसके बिना ही चलना सीखा है मैंने।" "तू छोड़ गई कोई बात नहीं,अब खुद से वफ़ा करके दिखाऊँगा।" "मर्द टूटते हैं, बिखरते नहीं...और जो छोड़ जाते हैं, वो लौटते नहीं।" "जिसने मुश्किल वक़्त में पीठ दिखाई,उसे ही जीत के मंजर नहीं दिखाए जाते।" "तेरे जाने से खत्म नहीं हुआ कुछ,अब मेरी शुरुआत अकेले से होगी।" "बुजदिल औरतें साथ नहीं निभातीं,मजबूत मर्द अकेले इतिहास रचते हैं।" "जिसने छोड़ा, उसने खोया...जिसे छोड़ा गया, वो तो आज भी जीत रहा है।" "अब तन्हाई मेरी ताक़त है,और तेरी याद बस एक सीढ़ी... ऊँचाई की।"
- वो लोग पूछते है कमाई मेरी, जो पूछते नहीं तबियत हमारी।~ आकाश मौर्य..2025
कितनी अजीब बात है कि ज़माना आजकल इंसान की इंसानियत से ज़्यादा उसकी कमाई को तवज्जो देता है। वो लोग जो हालचाल तक नहीं पूछते, जो ये तक नहीं जानते कि हम ज़िंदा भी हैं या नहीं, वो बड़ी बेफिक्री से पूछ बैठते हैं – "कितना कमा लेते हो?" उन्हें हमारी थकान, हमारी हालत, या हमारे जज़्बात से कोई वास्ता नहीं होता। रिश्ते अब भावनाओं से नहीं, बैलेंस शीट से तौले जाने लगे हैं। और यही सच है आज की दुनिया का – जहाँ लोग मतलब के बिना हाल नहीं पूछते और मतलब हो, तो हालात की फिक्र नहीं करते। वो लोग पूछते है कमाई मेरी, जो पूछते नहीं तबियत हमारी। ~ आकाश मौर्य Those people ask about my income, who do not ask about my health. ~ Akash Maurya "कमाई पूछने वाले बहुत हैं,पर हाल-ए-दिल जानने वाला कोई नहीं।" "जो लोग तबियत नहीं पूछते,वो भी जज बन बैठे हैं कमाई पर।" "रिश्ते अब दिल से नहीं,बैंक बैलेंस से तौलते हैं लोग।" "जिन्हें हमारी हालत का अंदाज़ा नहीं,वो हमारी हैसियत पर सवाल करते हैं।" "कमाई पूछना आसान है,मगर हाल पूछना इरादों की बात होती है।" "हमसे मुहब्बत नहीं, बस आमदनी से मतलब है उन्हें।" "तबियत पूछने का वक्त नहीं,मगर जेब में क्या है, ये सबको जानना है।" "कमाई का हिसाब मांगने वाले,क्या हमारी थकान का भी मोल देंगे?"
- रात भर इतना याद करता हूँ तुम्हें.❣सुबह जैसे इम्तिहान हो मेरा..❣❣
नींद आती नहीं, बस तेरी बातें चलती हैं,तन्हा रातों में तेरी यादें पलकों पे छलती हैं…🌙 हर करवट में तेरा नाम बसा होता है,हर ख़्वाब में तेरा ही चेहरा खिला होता है…✨ और फिर सुबह…जैसे एक सवाल बनकर सामने आ जाती है,कि "क्या आज भी तुझसे बिछड़ कर जिया जाएगा?" 💔 "रात भर इतना याद करता हूँ तुम्हें…❣सुबह जैसे इम्तिहान हो मेरा…❣❣" रात भर इतना याद करता हूँ तुम्हें.❣ सुबह जैसे इम्तिहान हो मेरा..❣❣ I miss you so much the whole night.❣ It's like I have an exam in the morning..❣❣
- सही व्यक्ति से किया गया प्रेम.❣उदास चेहरे को भी रंगीन बनाती है..❣❣
जब दिल को समझने वाला कोई पास हो,तो हर खामोशी भी एक मीठी बात बन जाती है…💫 जब हाथ थामने वाला सही हो,तो हर राह आसान सी लगने लगती है…🌈 सही इश्क़ ना सिर्फ़ दिल को,बल्कि ज़िंदगी को भी नया रंग दे देता है…❣क्योंकि प्यार तब जादू बनता है,जब वो सही इंसान से होता है… ✨ "सही व्यक्ति से किया गया प्रेम…❣ उदास चेहरे को भी रंगीन बना देता है…❣❣" सही व्यक्ति से किया गया प्रेम.❣ उदास चेहरे को भी रंगीन बनाती है..❣❣ Love with the right person.❣ It makes even a sad face colorful..❣❣











