प्रेम और इच्छा का अंतर
- ELA

- 5 दिन पहले
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गाँव के बाहर एक पुराना बरगद था,जहाँ लोग अक्सर जीवन की उलझनों पर बात करने आते थे।वहीं एक दिन एक युवक बैठा था—मन में बेचैनी, आँखों में भ्रम।
वृद्ध साधक ने उसे देखा और कहा,“तुम्हारी उलझन प्रेम की नहीं,इच्छा की है।”
युवक चुप रहा।
साधक बोले—“यदि कभी किसी स्त्री की देह चाहिए हो,तो साहस रखो और सच्चे रहो।बिना लाग-लपेट के,विनम्रता से अपनी बात कहो।यदि वह स्वीकार करे,तो उसे अनुग्रह समझो।और यदि अस्वीकार करे,तो उसकी इच्छा का सम्मान करवहीं से लौट जाओ—जहाँ से आए थे।”
फिर उन्होंने ठहरकर कहा—“लेकिन कभी अपनी कामना कोप्रेम का नाम देकर मत परोसना।इच्छा को प्रेम के आवरण में लपेटनासबसे बड़ा छल है।”
युवक ने सिर झुका लिया।
“हाँ,” साधक आगे बोले,“ऐसा करके शायद तुम देह पा लो,लेकिन साथ मेंएक ऐसी आत्मा भी तुम्हारे साथ आएगीजो तुम्हारे प्रेम पर विश्वास कर बैठी होगी।और जब तुम्हारी ज़रूरत पूरी हो जाएगी,तो वह आत्मा टूट जाएगी—निर्दोष, असहाय, और ठुकराई हुई।”
“उस टूटन का बोझ,”साधक की आवाज़ गहरी हो गई,“तुम उम्र भर अपने भीतर ढोओगे।”
युवक की आँखें भर आईं।उसे पहली बार समझ आया—प्रेम अधिकार नहीं होता,ज़िम्मेदारी होता है।और इच्छा का सम्मान तभी हैजब उसमें सच्चाई और सहमति हो।
वह बरगद के नीचे से उठा,पहले से हल्का,पहले से बेहतर इंसान बनकर—क्योंकि उसने सीख लिया थाकि देह पाने से बड़ा मूल्यआत्मा को आहत न करने का होता है।
जो कभी चाहिए हो किसी स्त्री की देह तो
बिना किसी लागलपेट के सीधे जाकर
उससे विनम्रता से याचना कर लेना।
याचना स्वीकार हो जाये तो अनुग्रह मानना ,
न स्वीकार हो तो उसकी इच्छा का सम्मान
करते हुए लौट जाना,जहाँ से आये थे।
लेकिन जो कभी चाहिए स्त्री की देह तो प्रेम के रास्ते पर मत चलकर जाना,
अपनी कामना को प्रेम के आवरण में लपेटकर मत प्रस्तुत करना।
ऐसा करके देह तो अवश्य ही पा लोगे लेकिन साथ में देह के भीतर तुम्हारे प्रेम में डूबी उस स्त्री की आत्मा भी आएगी जिसकी तुम्हें ज़रूरत नही होगी और उस ठुकराई हुई निर्दोष आत्मा के गुनहगार तुम ता-उम्र रहोगे।



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