Love Of OverThinker
- ELA

- 2 जन॰
- 2 मिनट पठन
"ओवरथिंकर" जैसे लोग हर शब्द बोलने से पहले दर्ज़नों अर्थों में उसे तोड़ते-जोड़ते है-- हर ख़ामोशी को अपराध मानकर ख़ुद से पूछताछ करते है-- ओवरथिंकर प्रेम में इसलिए गहरे उतरते है क्युँकि उन्हें पता होता है- अनकहा क्या चोट पहुँचा सकता है- वे अपने भीतर ही हज़ारों संवाद कर लेते है ताकि सामने वाला एक भी असहज पल से न गुज़रे!-
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वे प्राथमिकता देते है पर दिखावे में नही बल्कि अपने हिस्से की नींद अपनी शांति अपने प्रश्न सब चुपचाप स्थगित कर देते है-- ओवरथिंकर पहले ख़ुद को समझाते हैं-- “शायद उसकी मजबूरी होगी”,“शायद मेरा सोचना ज़्यादा है”,“शायद प्रेम यही है-- ख़ुद को पीछे रख देना”
इसलिए वे सबसे ज़्यादा थकते है सबसे कम शिकायत करते है और टूटने पर भी टूटने की आवाज़ नहीं आने देते!-
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उनका प्रेम सुरक्षित होता है पर वे स्वयं असुरक्षित हो जाते है- वे रिश्ते बचाते-बचाते ख़ुद को खो देते है-- ओवरथिंकर बेस्ट प्रेम निभाते है क्युँकि वे प्रेम को अधिकार नही ज़िम्मेदारी मानते है-- और हर ज़िम्मेदारी की क़ीमत वे अपने भीतर चुकाते है पर विडंबना देखो—
जो सबसे ज़्यादा सोचकर प्रेम करता है उसी से कहा जाता है-- “तुम ज़्यादा सोचते हो”और वो मुस्कुरा देता है,
क्युँकि उसने इस उत्तर की भी पहले ही तैयारी कर रखी होती है!-
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अंत मे कहूं कुछ -- "मै खुद एक ओवरथिंकर ही हूँ "!- लेकिन मुझे इस शब्द से नफ़रत नहीं होती है बल्कि प्रेम होता है ---
“ओवरथिंकर”
वह उन लोगों में से था जो हर शब्द बोलने से पहलेउसे दर्ज़नों अर्थों में तोड़कर, जोड़कर देखते थे।किसी की ख़ामोशी भी उसे बेवजह की नहीं लगती थी—वह उसे अपराध मानकरख़ुद से पूछताछ करता रहता,“कहीं मैंने कुछ गलत तो नहीं कह दिया?”
वह प्रेम में गहरे उतरता था,क्योंकि उसे पता था—अनकहा शब्द सबसे ज़्यादा चोट पहुँचा सकता है।इसलिए वह अपने भीतरहज़ारों संवाद कर लेता,ताकि सामने वालाएक भी असहज पल से न गुज़रे।
वह प्राथमिकता देता था,लेकिन दिखावे में नहीं।अपने हिस्से की नींद,अपनी शांति,अपने सवाल—सब चुपचाप स्थगित कर देता।पहले ख़ुद को समझाता,“शायद उसकी मजबूरी होगी,”“शायद मेरा सोचना ज़्यादा है,”“शायद प्रेम यही है—ख़ुद को थोड़ा पीछे रख देना।”
इसीलिए वह सबसे ज़्यादा थकता,सबसे कम शिकायत करता।और जब टूटता,तो टूटने की आवाज़ तकबाहर नहीं आने देता।
उसका प्रेम सुरक्षित होता था,लेकिन वह स्वयं असुरक्षित हो जाता।रिश्तों को बचाते-बचातेकभी-कभी ख़ुद को खो देता।वह प्रेम को अधिकार नहीं,ज़िम्मेदारी मानता था—और हर ज़िम्मेदारी की क़ीमतअपने भीतर चुकाता था।
विडंबना देखो—जो सबसे ज़्यादा सोचकर प्रेम करता है,उसी से कहा जाता है,“तुम ज़्यादा सोचते हो।”वह मुस्कुरा देता…क्योंकि इस उत्तर की भीतैयारी वह पहले ही कर चुका होता है।
अंत में बस इतना—वह ख़ुद एक ओवरथिंकर था।और इस शब्द से उसे नफ़रत नहीं,बल्कि एक अजीब-सागहरा प्रेम था।



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