क्या मानव को खुश रहने के लिए तामझाम ज़रूरी हैं?
- ELA

- 9 अग॰ 2025
- 3 मिनट पठन
यह प्रश्न जितना सरल प्रतीत होता है, उतना ही जटिल इसका उत्तर है। यदि आदर्श की बात करें तो शायद उत्तर “नहीं” होना चाहिए, परंतु यदि वर्तमान समाज और आज के यथार्थ को देखें, तो इस सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता कि आज के समय में खुश रहने के लिए तामझाम को लगभग अनिवार्य बना दिया गया है।
आज मानव जीवन की लगभग 98% समस्याओं का केंद्र बिंदु पैसा बन चुका है। चाहे वह सम्मान हो, सुरक्षा हो, शिक्षा हो या स्वास्थ्य हर समस्या का समाधान धन से जोड़कर देखा जाता है। यह स्थिति यूँ ही नहीं बनी, बल्कि समाज की सामूहिक मानसिकता ने इसे जन्म दिया है।
पैसा और सम्मान का नया समीकरण
आज की दुनिया में अधिकांश लोग पहले यह नहीं पूछते कि कोई व्यक्ति कैसा है, बल्कि यह पूछते हैं कि उसके पास कितना है। जिसके पास जितना अधिक धन, समाज में उसका स्थान उतना ऊँचा।
सम्मान अब चरित्र, ज्ञान या संवेदनशीलता से नहीं, बल्कि बैंक बैलेंस से मापा जाने लगा है। यही कारण है कि लोग पैसों को साधन नहीं, बल्कि अंतिम लक्ष्य मान बैठे हैं।
हर समस्या का समाधान सिर्फ पैसा?
मानव आज इस भ्रम में जी रहा है कि हर समस्या का हल पैसे से खरीदा जा सकता है।
बेहतर इलाज चाहिए:- महँगा अस्पताल
बच्चों का भविष्य सुरक्षित चाहिए :- महँगी स्कूलिंग
मानसिक शांति चाहिए :-महँगे कोर्स, रिट्रीट और गुरु
यहाँ तक कि ध्यान और आत्मिक शांति, जो कभी मनुष्य की सबसे सहज और प्राकृतिक क्षमता थी, उसे भी बाज़ार में बेचने की वस्तु बना दिया गया है।
ध्यान: जो कभी प्रकृति था, आज उत्पाद है
ध्यान तो उतना ही प्राकृतिक है जितनी हवा, पानी और साँस।
यह मनुष्य को बाहर से नहीं, अंदर की ओर ले जाने की प्रक्रिया है।
पर आज स्थिति यह है कि लोग ध्यान सीखने के लिए करोड़ों खर्च करने को तैयार हैं जैसे शांति भी कोई लक्ज़री प्रोडक्ट हो।
आज “ध्यान” भी पैकेज में बिकता है
वीआईपी ध्यान, स्पेशल ध्यान, एक्सक्लूसिव शांति।
यही तो है “जैसा राजा, वैसी प्रजा” जहाँ पैसा है, वहाँ विशेष अधिकार हैं।
बाज़ार बनाम आत्मा
समस्या पैसा होने में नहीं है, समस्या यह है कि हमने हर अनुभव को बाज़ार के हवाले कर दिया है।
जहाँ आत्मा की यात्रा होनी थी, वहाँ विज्ञापन पहुँच गया।
जहाँ मौन होना था, वहाँ शोर बिकने लगा।
मनुष्य बाहरी सुविधाओं में इतना उलझ गया है कि उसने भीतर झाँकना ही छोड़ दिया।
और जब भीतर खालीपन महसूस होता है, तो वह उसे भरने के लिए फिर बाहर की चीज़ें खरीदता है एक अंतहीन चक्र।
वास्तविक खुशी कहाँ है?
सच यह है कि तामझाम सुविधा दे सकता है, सुरक्षा दे सकता है, पर स्थायी खुशी नहीं।
खुशी तब आती है जब मनुष्य
अपनी आवश्यकताओं को समझे
तुलना करना छोड़े
और यह स्वीकार करे कि कुछ चीज़ें खरीदी नहीं जा सकतीं
ध्यान, शांति, संतोष ये सब अंदर से उगते हैं, बाहर से नहीं लाए जाते।
आज के समय में यह कहना गलत नहीं होगा कि समाज ने खुश रहने के लिए तामझाम को आवश्यक बना दिया है।
लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि यह आवश्यकता प्राकृतिक नहीं, कृत्रिम है।
जब तक मनुष्य पैसा को साधन की जगह साध्य मानता रहेगा, तब तक वह बाहर सब कुछ पाकर भी भीतर से खाली ही रहेगा।
और जिस दिन वह यह समझ लेगा कि असली समृद्धि भीतर है, उस दिन तामझाम अपने आप अनावश्यक हो जाएगा।



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