भीतर जाओ
- ELA

- Dec 13, 2024
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तुम सोचते हो—बहुत सारा पैसा होगा तो जीवन आनंद से भर जाएगा।तुम सोचते हो—जिस इंसान को चाहते हो, अगर वही तुम्हारा हो जाए तो खुशियाँ अपने आप आ जाएँगी।तुम सोचते हो—बड़ी गाड़ी, बड़ा घर, ऊँचा ओहदा, कलेक्टर बन जाना, नेता या सेलिब्रिटी हो जाना ही सुकून है।तुम सोचते हो—दुनिया घूम आओ, भोग-विलास कर लो, लोग आगे-पीछे घूमें, सम्मान करें… तब जाकर चैन मिलेगा।
लेकिन सच यह है—ऐसे हज़ारों लोगों को मैंने जीवन के बहुत पास से देखा है। उनके पास सब कुछ है—सुविधाएँ, ऐश्वर्य, ऐश, नाम और पहचान। फिर भी उनके चेहरे पर शांति नहीं, आँखों में ठहराव नहीं, जीवन में उत्सव नहीं।अंदर कहीं न कहीं द्वंद्व है, बेचैनी है, होड़ है, डर है। बाहर हँसी है, भीतर थकान।उन्हें सुख का भ्रम है, आनंद का नहीं।
तो फिर आनंद मिलता कहाँ है?
आनंद का, सुकून का स्रोत बाहर नहीं—वह तुम्हारे भीतर है।दुर्भाग्य यह है कि उस भीतर के दरवाज़े को हम पूरी ज़िंदगी बंद रख देते हैं।
उस दरवाज़े को खोलने के रास्ते हैं—ध्यान में उतरना,मौन को जीना,अपनी चेतना से जुड़ना,स्व-प्रेम और आत्म-आदर सीखना,साक्षी भाव से जीवन को देखना।अपनी देह, अपने भाव, अपनी आत्मा का ख्याल रखना।
जिस दिन तुम स्वयं को पा लोगे,जिस दिन आत्म-साक्षात्कार की एक झलक मिल जाएगी—उस दिन महल भी आनंद देगा, झोपड़ी भी।प्राइवेट प्लेन भी और साइकिल भी।पाना भी सुंदर लगेगा, खोना भी।हँसना भी अर्थपूर्ण होगा, रोना भी।
भीतर जाओ—बाहर का संसार अपने आप शुभ, सरल और सुंदर लगने लगेगा।



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