(एक अनकही मोहब्बत की दास्तान)
प्रेम… एक ऐसा अनुभव जो जीवन को संपूर्ण बना देता है, और कभी-कभी अधूरा छोड़कर भी भीतर एक अनोखी पूर्णता भर देता है। लेकिन क्या हर प्रेम का अंजाम 'मिलन' होना चाहिए? क्या सिर्फ इसलिए कि हमने किसी को दिल से चाहा, हमें उन्हें पाना भी चाहिए?
कुछ प्रेम ऐसे होते हैं जो पाने के लिए नहीं, बस महसूस करने के लिए होते हैं। जिनमें सामने वाले के साथ रहने की कोई ज़िद नहीं होती, बल्कि उसे अपने ख्यालों में, अपनी कल्पनाओं में संजोकर रखने की चाह होती है। वो प्रेम, जो हक नहीं मांगता—बस दूर से देख कर खुश हो जाता है।
ऐसा प्रेम तब भी ज़िंदा रहता है जब सामने वाला हमारी भावनाओं से अनजान होता है, या फिर जानकर भी नज़रअंदाज़ करता है। लेकिन उस उपेक्षा में भी एक अपनापन होता है, एक आदत, एक दर्द, जो हमें उसकी ओर और गहराई से बाँधता चला जाता है।
हो सकता है वो हमारी ज़िन्दगी में कभी न लौटे, या लौटे तो किसी और रूप में—किसी और रिश्ते में। लेकिन अगर उसकी ख़ुशी किसी और के पास है, तो एक सच्चा प्रेमी उस ख़ुशी में ही अपने प्रेम को पा लेता है। क्योंकि असली प्रेम स्वार्थ नहीं होता, बल्कि त्याग होता है।
कभी-कभी हमारी चाहत अधूरी रह जाती है, लेकिन वो अधूरापन ही हमें एक अलग किस्म की पूर्णता देता है। कुछ यादें, कुछ खामोश लम्हे, कुछ अनकही बातें… और यही अनकहा प्रेम जीवन भर हमारे साथ चलता है—बिना किसी अपेक्षा के, सिर्फ एक अहसास बनकर।
तो हाँ,
प्रेम में पाना ज़रूरी नहीं होता।
बस प्रेम करना ही काफी होता है।
