top of page

यह बकवास किसने फैलाई कि स्त्री पर हाथ नहीं उठाया जाना चाहिए ?

  • Writer: ELA
    ELA
  • Jun 13, 2025
  • 2 min read

हनुमान जी ने भी दो गदा खींच के मारी थी लंकिनी को। भरत ने अपनी माँ को भला बुरा सुनाया था और मंथरा के भी कंटाप पड़े थे ।

सूर्पनखा की केवल नाक कान ही नहीं कटे होंगे, कायदे से सुताई भी हुई होगी। अब रानी चेनम्मा और रानी लक्ष्मीबाई युद्ध के मैदान में गयी तो क्या स्त्री समझ कर उन पर वार नहीं किया गया होगा ? युद्ध का मैदान स्त्री पुरुष का भेद क्या जाने। लड़ना है तो लड़ो नहीं तो और काम है करने को।

कन्या है तो हाथ मत उठाओ, आखिर क्यों भाई? गलती करेगी तो मार भी पड़ेगी जैसे बेटे को पड़ती है। सब सुविधा दो लेकिन हाथ मत उठाओ। इसी मानसिकता ने सारी गड़बड़ की है। दो थप्पड़ बचपन में लगाओ और फिर बताओ की तुम कहीं की परी नहीं हो। गलती करोगी तो सूती जाओगी। तब वह एक दम सही रास्ते पे चलेगी।

सारा काम मेरी गुडिया, मेरी रानी, मेरी परी करने वालों ने बिगाड़ा है।

जिसकी समझ आए धन्यवाद 🙏

जो नहीं समझ पाए उनसे क्षमा.🙏



संतुलित और सकारात्मक अर्थ

“यह बात केवल स्त्री–पुरुष के भेद की नहीं है, बल्कि सही और गलत की पहचान की है। इतिहास के उदाहरण यह बताते हैं कि अन्याय, अहंकार और अनुशासनहीनता से किसी का भी सामना किया जाए—वह पुरुष हो या स्त्री। लेकिन इसका यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि स्त्रियों पर या किसी भी इंसान पर हिंसा की अनुमति है। असली संदेश यह है कि बच्चों—चाहे बेटे हों या बेटियाँ—को बचपन से ही अनुशासन, जिम्मेदारी और सही-गलत का भेद सिखाया जाए। उन्हें ‘परी’, ‘रानी’ कहकर गलतियों को अनदेखा करना उनके भविष्य के लिए ठीक नहीं होता। प्यार के साथ-साथ अनुशासन और सही दिशा भी उतनी ही ज़रूरी है। जीवन में सुधार डांट, समझ और मार्गदर्शन से आता है, न कि अत्याचार से। इसलिए ज़रूरी है कि बच्चों को समानता, मर्यादा और सही संस्कार दिए जाएँ ताकि वे मजबूत, संवेदनशील और जिम्मेदार इंसान बन सकें।”


 
 
 

Comments

Rated 0 out of 5 stars.
No ratings yet

Add a rating
bottom of page