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शादी करने जा रहे बेटे को पिता ने पास बुलाकर उसके सिर पर हाथ रखते हुए कहा

"पुराने ज़माने में नई दुल्हन को पालकी में क्यों बिठाया जाता था, पता है? उसे तो बैलगाड़ी में भी लाया जा सकता था। लेकिन नहीं, उसे पालकी में बिठाया जाता था — ताकि यह दिखाया जा सके कि वह कितनी सम्मानित है। और जब उसे पालकी से उतारा जाए, तो उस सम्मान में कभी कमी नहीं आनी चाहिए। तुझे उसकी पूरी ज़िंदगी पालकी वाले सम्मान में ही रखना है।"

"नई दुल्हन पालकी में चढ़ते वक़्त क्या करती है, जानता है? वो रोती है। क्यों रोती है? सिर्फ पीछे छूटे अपनों के लिए नहीं, बल्कि नए जीवन के डर से भी। तेरा काम होगा — पालकी की वह पहली और आख़िरी बार की रुलाई हो। इसके बाद वो सिर्फ दो मौकों पर रोए—

1. माँ बनने की ख़ुशी में,

2. और जब तू इस दुनिया से चला जाएगा।

इसके बीच जीवन में जितने भी दुःख आएं, तू उसके आँसू पोंछेगा।

जानता है एक पत्नी को सबसे ज़्यादा दुख कब होता है? पति के बुरे व्यवहार से।

देख, मैं बहुत गुस्सैल हूँ, लेकिन आज तक किसी को ये कहते नहीं सुना होगा कि मैंने तेरी माँ से ऊँची आवाज़ में बात की हो। शादी का मतलब होता है — एक और बेटी की ज़िम्मेदारी लेना। और अगर इस ज़िम्मेदारी को सही से नहीं निभाया, तो ऊपर वाले के सामने जवाबदेह होना पड़ेगा।"

"दूसरी बात — अपनी पत्नी के माँ-बाप को कभी ‘मेरे सास-ससुर’ मत कहना। उन्हें 'माँ-बाप' कहकर बुलाना। कोई भी लड़की ये पुराने रिश्तों वाले शब्द पसंद नहीं करती। जब तू उन्हें माँ-बाप कहेगा, तभी वह भी हमें वही कहेगी। यही सही तरीका है।"

"याद रख, ऊपरवाले का तराजू बराबरी का होता है। एक पलड़े में तू जो रखेगा, वो दूसरे में वही भरेंगे और दोनों का वजन बराबर रहेगा।"

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