क्या कभी आपके साथ ऐसा हुआ है कि एक दिन आप उठते हैं और महसूस करते हैं कि आप बस ऑटो-पायलट पर जी रहे हैं? मुस्कुरा रहे हैं जब मन नहीं है। “मैं ठीक हूँ” कह रहे हैं, जबकि अंदर कुछ भी ठीक नहीं है।
हाँ... मेरे साथ भी।
कभी-कभी हम खुद से कट जाते हैं क्योंकि यही ज़्यादा सुरक्षित लगता है। ज़िंदगी कभी थमती नहीं, तो हम भी नहीं थमते। लेकिन एक वक़्त आता है जब आत्मा आपके कंधे पर हल्के से थपकी देती है और कहती है, “अरे... मुझे याद है?”
छोटे से शुरू करो। बिना फ़ोन के एक टहल लो। वो लिखो जो तुम सच में महसूस करते हो, न कि वो जो तुम्हें लग रहा है कि महसूस करना चाहिए।
खुद को देखने दो — खुद के द्वारा।
तुम्हें सब कुछ अभी समझना ज़रूरी नहीं है। बस खुद को एक नर्म, सुकून भरी जगह दो जहाँ तुम थक कर बैठ सको।
अब तक तुम सबके लिए थे।
अब बारी तुम्हारी है।
"ऑटो-पायलट पर जी रहे हैं?" यह वाक्य हमारे आधुनिक जीवन की एक कड़वी सच्चाई को उजागर करता है। आज की तेज़ रफ्तार और व्यस्त दिनचर्या में अधिकांश लोग बिना सचेत सोच-विचार के, एक निर्धारित रूटीन पर चलते जा रहे हैं—जैसे सुबह उठना, काम पर जाना, मोबाइल देखना, सोशल मीडिया पर समय बिताना और रात को थक कर सो जाना। इस पूरी प्रक्रिया में न तो आत्ममंथन होता है, न ही जीवन के उद्देश्य पर ध्यान। हम मशीनों की तरह बन गए हैं जो सिर्फ आदेशों पर चलते हैं, अपने मन और दिल की आवाज़ सुनना भूल चुके हैं। ऑटो-पायलट मोड में जीना आसान ज़रूर लगता है, पर यह धीरे-धीरे हमारी रचनात्मकता, भावनाओं और आत्म-चेतना को खो देता है। समय आ गया है कि हम रुकें, सोचें और अपने जीवन को सचेत रूप से जीने की दिशा में कदम बढ़ाएं।
