"अगर कोई पुरुष सिर्फ रात की ज़रूरत पूरी करने के लिए तुम्हारे पास आता है— जब तुम बीमार होती हो, कमजोर होती हो, तब भी वह तुम्हारे शरीर पर टूट पड़ता है जैसे कोई दरिंदा— तो समझ लो, उसके लिए तुम सिर्फ एक व्यापार हो, या फिर एक वेश्या।
तुम उसकी पत्नी कभी नहीं थीं।
अगर तुम अपने दिल पर लगे ताजे ज़ख्म के साथ, अपने सच्चे प्यार को छोड़ कर सिर्फ परिवार के लिए एक कोने में चुपचाप रो रही हो, और वह व्यक्ति तुम्हारे आंसुओं की परवाह किए बिना तुम्हारे कपड़े उतारने में व्यस्त हो— तो जान लो, वह सिर्फ तुम्हारे शरीर को चाहता है, तुम्हारे मन को नहीं।
तुम दिन भर उसकी गृहस्थी संभालती हो, दर्द छिपा कर उसे सहेजती हो— फिर भी अगर वह एक बार भी नहीं कहता ‘थोड़ा आराम कर लो’— तो वह घर तुम्हारे लिए एक घर नहीं, एक काम की जगह है। वहां तुम पत्नी नहीं, बस एक नौकरानी हो।
जो व्यक्ति तुम्हें समझने की कोशिश नहीं करता, सिर्फ तुम्हें दोष देता है— वह तुम्हारा जीवनसाथी नहीं हो सकता। उसके लिए तुम बस एक ज़िम्मेदारी हो, एक बोझ।
अगर वह तुम्हारे दुख में तुम्हारे साथ नहीं होता, खास दिनों में तुम्हारे लिए समय नहीं निकालता, तुम्हारे शौक और पसंद की कोई कद्र नहीं करता— तो उसने तुम्हें कभी अपना अर्धांगिनी नहीं माना। उसके लिए तुम सिर्फ उसका खाली समय बिताने का जरिया हो।
जो व्यक्ति रिश्ते के नाम पर सिर्फ तुम्हारे शरीर का उपभोग करता है, तुम्हारे आँसू, तुम्हारी बीमारी से जिसे कोई फर्क नहीं पड़ता— उसे तुम कभी अपना पति नहीं कह सकतीं।
अगर वो घर के हर फैसले तुमसे पूछे बिना तुम पर थोप देता है— तो जान लो, उसने तुम्हें कभी बराबरी का दर्जा नहीं दिया। वह तुम्हें सिर्फ एक ज़रूरत समझता है, प्यार नहीं।
अगर तुम एकतरफा बलिदान करती जा रही हो, और वह सिर्फ तुम्हारी गलतियां गिनता रहता है— तो खुद को उसकी पत्नी कहने का कोई मतलब नहीं।
ऐसे रिश्ते में, जहां तुम अकेले लड़ रही हो, सह रही हो— वहां तुम्हारी कोई इज्जत नहीं, कोई कीमत नहीं। और इसी बेइज़्ज़ती की ज़िन्दगी में तुम एक दिन उस ‘अमानवीय’ पुरुष का बच्चा अपने गर्भ में पालोगी।
फिर क्या?
उस बच्चे के लिए, साल दर साल, दिन दर दिन— तुम्हें उसी घर में ‘व्यापार’, ‘वेश्या’ या ‘नौकरानी’ बनकर रहना होगा।
सब सहते हुए, चुप रहकर।
और अगर तुम इस नर्क से निकलना चाहती हो— तो तुम्हें एक नया जन्म लेना होगा। एक पूरा, साहसी, और अडिग पुनर्जन्म।
