क्या हम सच में जी रहे हैं… या बस जीवन काट रहे हैं?
जीवन की भागदौड़ के बीच एक बहुत ही शांत और गहरा सवाल मन में उठता है
क्या हम सच में जीवन जी रहे हैं, या बस उसे काट रहे हैं?
सुबह आँख खुलती है, वही घड़ी का अलार्म बजता है। हम उठते हैं, जल्दी-जल्दी तैयार होते हैं, वही रास्ता पकड़ते हैं और अपने काम की जगह पहुँच जाते हैं। दिन भर काम, जिम्मेदारियाँ, बातचीत, थकान… और फिर शाम को घर वापसी।
अगले दिन फिर वही क्रम।
फिर वही दिनचर्या।
फिर वही जीवन।
