बिछड़ाव क्यों नहीं होगा?
अब लोगों के लिए ना प्यार की क़द्र है, ना वक्त की, ना ही जज़्बातों की।
क़द्र सिर्फ ग़ुस्से की है, अहंकार की है, स्वार्थ की है, बाहरी सुंदरता और आकर्षण की है।
लोग साथ निभाने से ज़्यादा, साथ छोड़ना पसंद करते हैं।
खुद को बदलने से पहले दूसरों के बदलने की उम्मीद रखते हैं।
ग़ुस्से और ज़िद में रिश्ते को एक प्रतियोगिता बना देते हैं।
रिश्ते को खूबसूरत बनाने से बेहतर उन्हें लगता है कि कोई और इससे बेहतर मिल जाएगा।
इसलिए बिछड़ाव होना तो जैसे अब आम बात बन गई है।
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