सिर्फ एक-दो बच्चे—और धीरे-धीरे खोते रिश्ते
आजकल जब भी किसी से बच्चों की बात छिड़ती है, एक आम जवाब सुनने को मिलता है—"एक या दो बच्चे ही काफी हैं। ज़माना ऐसा है, ज़िम्मेदारियाँ बहुत हैं, खर्चा भी कम नहीं।"
कहने को यह बात तर्कपूर्ण लगती है, लेकिन क्या हमने कभी यह सोचा कि इस सोच के पीछे हम क्या खो रहे हैं?
कभी हमारे घरों में चहल-पहल होती थी।
घर सिर्फ माँ-बाप और बच्चों तक सीमित नहीं था।
पूजाघर से लेकर रसोई तक रिश्तेदारों की आवाजाही बनी रहती थी।
बचपन में हम जिन रिश्तों से घिरे रहते थे, वो हमारे पहले स्कूल थे—संस्कारों के, सामाजिकता के, जिम्मेदारी के।
जब घर में चार-पाँच भाई-बहन होते थे, तो कोई ना कोई काका होता था, कोई मामा, कोई फूफा, कोई मौसी।
उनके भी बच्चे होते थे—फुफेरे भाई, मौसेरे बहन।
त्योहारों में घर भर जाता था, बरामदे में हँसी की गूंज, आँगन में बच्चों की धमा-चौकड़ी।
रात में बिस्तर पर लेटे-लेटे किस्से सुनते थे—नानी से, दादी से।
लेकिन अब?
अब एक बच्चा है, या दो।
उसका कोई चाचा नहीं, कोई मामी नहीं।
ना फूफी आती हैं, ना मामा का कोई चिठ्ठी-पत्र।
और बच्चे से पूछो—"तुम्हारे कितने भाई हैं?"
तो मुस्कुरा कर कहता है, "मैं तो अकेला हूँ।"
ये अकेलापन केवल उसकी गिनती में नहीं है, ये उसके जीवन में उतर आया है।
अब त्योहार बस एक छुट्टी है।
संस्कार अब यूट्यूब से सिखाए जाते हैं।
रिश्ते अब व्हाट्सएप के स्टिकर हैं।
और जब दुख-सुख आता है, तो घर में चार दीवारें होती हैं, रिश्ते नहीं।
ये केवल परिवार छोटा होने का मामला नहीं है।
ये सामाजिक ताने-बाने के धीरे-धीरे टूटने की कहानी है।
जहाँ पहले संकट में पूरा कुनबा खड़ा होता था, अब अकेला इंसान फ्रस्ट्रेशन और डिप्रेशन में घिरा मिलता है।
संवाद कम हो रहे हैं, संवेदना खो रही है।
हम यह नहीं कह रहे कि सबको ढेर सारे बच्चे पैदा करने चाहिए।
लेकिन अगर चार लोगों का पेट भर सकते हो, तो चार बच्चों को पालने से डर क्यों लगता है?
शायद हमें फिर से सोचना चाहिए।
शायद यह बदलाव केवल आधुनिकता नहीं, कोई रणनीति है—हमें अकेला करने की, कमज़ोर बनाने की।
क्योंकि जब परिवार बिखरता है, समाज कमजोर होता है।
और जब समाज कमजोर होता है, तो कोई भी उसे अपने हिसाब से चला सकता है।
संभलने का समय है—अपने लिए नहीं, आनेवाली पीढ़ियों के लिए।
