सैनिक के नाम खाली चेक
मैं विमान में बैठ चुका था, दिल्ली जा रहा था, लगभग दो घंटे की यात्रा। सोचा था—थोड़ा शांत बैठकर किताब पढ़ूंगा और रास्ते में थोड़ा आंखें भी बंद कर लूंगा।
टेकऑफ से ठीक पहले देखा कि विमान का दरवाज़ा फिर से खोला गया और एक समूह में लगभग दस भारतीय सैनिक अंदर आए। वे एक-एक कर मेरे आसपास की सीटों पर बैठ गए। चेहरों पर एक अजीब सी शांति और गंभीरता थी।
मेरे पास बैठे एक जवान से मैंने पूछा, "कहाँ जा रहे हैं आप लोग?"
वह बोला, “आगरा। दो हफ्ते की ट्रेनिंग है, फिर ऑपरेशन।”
इतना कहकर वह चुप हो गया। क्या ऑपरेशन है, कहाँ है—कुछ नहीं बताया। समझ गया, बताने की इजाज़त नहीं है।
करीब एक घंटा बीत गया था, तभी एयर होस्टेस की घोषणा हुई—“आप सभी के लिए लंच परोसा जाएगा, जो चाहें वे पैसे देकर खाना खरीद सकते हैं।”
मैं पर्स निकाल ही रहा था कि सुनाई दिया—वे जवान आपस में बात कर रहे हैं:
“खाना खाएगा?” “धत, यहाँ बहुत महंगा है। नीचे उतरकर होटल में खाएंगे।”
कुछ तो हुआ अंदर... चुपचाप जाकर एयर होस्टेस से कहा, “इन सबके खाने का पैसा मैं दे रहा हूँ, कृपया इन्हें खाना दे दीजिए।”
उस लड़की की आँखों में आँसू आ गए। धीरे से बोली, “सर, मेरा भाई कारगिल में है। ऐसा लग रहा है जैसे आप उसे ही खाना खिला रहे हों...!”
मन कुछ भारी सा हो गया। वापस अपनी सीट पर आ गया। आधा घंटा भी नहीं बीता था कि सब जवानों के पास खाना पहुँच गया। वे थोड़े हैरान हुए... क्या सोचा उन्होंने पता नहीं... पर खाना खोला और खाने लगे। देखकर लग रहा था वे भूखे थे।
मैं अपना खाना खत्म करके वॉशरूम की ओर जा रहा था, तभी एक बुजुर्ग आगे आए। बोले, “सब देखा मैंने। आप वाकई एक अच्छे इंसान हैं, सर।”
फिर चुपचाप 500 रुपये का नोट मेरी हथेली में रखकर बोले, “इस अच्छे काम में मैं भी थोड़ा हिस्सा लेना चाहता हूँ।”
मैं कुछ कह पाता, इससे पहले ही वे अपनी सीट पर लौट गए।
वापस आया तो सोच रहा था—यह सब क्या हो रहा है...? तभी देखा कि पायलट खुद मेरी सीट पर चले आए!
मैं सीट बेल्ट खोलकर खड़ा हो गया।
मुस्कुराते हुए बोले, “मैं आपसे हाथ मिलाना चाहता हूँ।”
मैं हैरान होकर बोला, “क्यों सर?”
वे बोले, “मैं खुद एक समय में फाइटर पायलट था। एक दिन एक अनजान व्यक्ति ने मेरे लिए खाना खरीदा था। आज आपने वही पल लौटा दिया... मैंने यह बात केबिन क्रू से सुनी।”
अचानक चारों तरफ तालियाँ बजने लगीं।
थोड़ा संकोच हुआ।
क्योंकि सच कहूँ तो मैंने कुछ खास किया ही नहीं... मन ने चाहा, बस इसलिए कर दिया... तालियों के लिए तो कुछ किया ही नहीं।
कुछ देर बाद, लगभग 18 साल का एक लड़का मुस्कुराता हुआ आया। हाथ मिलाया और एक कागज़ का टुकड़ा मेरी हथेली में थमा दिया। मैं जैसे किसी अलौकिक एहसास में था।
विमान उतरा।
सामान ले रहा था, तभी एक सज्जन चुपचाप मेरी जेब में कुछ डालकर तेजी से चले गए। फिर एक नोट...!
लगेज बेल्ट के पास देखा वे दसों सैनिक खड़े हैं, अपने सामान का इंतज़ार कर रहे हैं।
मैं दौड़कर उनके पास गया... कहा, “यह पैसे रख लीजिए। यह कुछ देशवासियों का प्यार है... ट्रेनिंग पर जाने से पहले ज़रूरत हो तो खर्च करिएगा। आप हमारे लिए जो करते हैं, उसका मूल्य चुकाना इस थोड़े से पैसों से संभव नहीं है... बस, एक छोटा-सा धन्यवाद देने आया हूँ।”
वे चुपचाप खड़े थे। किसी की आँखें नम थीं, कोई मुस्कुरा रहा था।
एक फ्लाइट भर देशवासियों का प्यार लेकर वे अब आगे बढ़ेंगे...!
मैं गाड़ी में बैठा।
आँखें बंद कर प्रार्थना की—
“हे भगवान, इन्हें सलामत रखना... ये तो अपनी जान हथेली पर रखकर देश के लिए मौत की ओर बढ़ते हैं।”
एक जवान का मतलब है—देश के नाम लिखा एक खाली चेक... जब ज़रूरत पड़े, देशवासी उसमें कुछ भी भर सकते हैं, यहाँ तक कि जीवन भी...!
और हममें से कई लोग तो यह समझना ही नहीं चाहते।
"जय हिंद"
