मेरा मोह
माँ पहले बहुत परेशान रहती थीं। उन्हें ठीक से नींद नहीं आती थी, उनका शरीर थका रहता था। वह चिड़चिड़ी हो गई थीं, बात-बात पर नाराज़ हो जाती थीं। हर समय कोई न कोई बीमारी घेरे रहती थी। पर फिर एक दिन कुछ बदल गया।
एक दिन पिताजी बोले:
"मैं तीन महीने से काम की तलाश में हूँ, कुछ नहीं मिला, आज दोस्तों के साथ बैठकर थोड़ा समय बिताऊँगा।"
माँ ने बस कहा:
"ठीक है।"
भाई बोला:
"माँ, मेरी पढ़ाई में बहुत परेशानी चल रही है।"
माँ बोलीं:
"कोई बात नहीं बेटा, सुधार हो जाएगा। नहीं हुआ तो साल दोहराना पड़ेगा, लेकिन फीस तुम खुद दोगे।"
बहन ने कहा:
"माँ, कार का एक्सीडेंट हो गया।"
माँ बोलीं:
"कोई बात नहीं, गाड़ी मैकेनिक को दिखा दो, खर्चा देखो और खुद व्यवस्था करो। जब तक ठीक नहीं होती, बस या मेट्रो से चलो।"
भाभी बोलीं:
"माँ, मैं कुछ महीने आपके घर रहना चाहती हूँ।"
माँ ने सहजता से कहा:
"ठीक है, बैठक में रह लो। अलमारी में रजाई-कंबल हैं, निकाल लो।"
हम सब अचंभित थे — ये माँ वही हैं?
हमें लगा माँ किसी डॉक्टर से मिल आई हैं और शायद कोई दवा ले रही हैं — जैसे "अब मुझे फ़र्क नहीं पड़ता" नाम की कोई चमत्कारी गोली!
हमने एक पारिवारिक सभा बुलाई ताकि माँ को “बचाया” जा सके।
लेकिन माँ ने बहुत शांति से सबको एकत्र किया और कहा:
"बहुत वर्षों तक मैं यही सोचती रही कि मेरे दुख, मेरी चिंता, मेरी रातों की नींद और मेरे अशांत मन से शायद तुम लोगों की समस्याएँ हल हो जाएँगी। लेकिन धीरे-धीरे समझ आया — यह मेरा मोह था।
हर आत्मा अपने कर्मों की स्वामिनी है। किसी का सुख-दुख, उसका कर्तव्य, उसका निर्णय — सब उसका अपना है। मैं माँ हूँ, ईश्वर नहीं।
अब मैंने यह स्वीकार किया है — मेरा धर्म है अपना मन शांत रखना, और हर किसी को उनके कर्मों के अनुसार जीने देना।
मैंने समय-समय पर ध्यान और आत्मचिंतन के माध्यम से जाना है — जीवन में आत्मनियंत्रण सबसे बड़ा तप है।
अब मैं सिर्फ प्रार्थना कर सकती हूँ, शुभचिंतन कर सकती हूँ, प्रेम दे सकती हूँ — लेकिन मैं किसी की ज़िंदगी नहीं जी सकती।
अगर कोई मुझसे मार्गदर्शन चाहे, मैं दूँगी, पर चलना उसे ही होगा। निर्णय उसके हैं, फल भी उसी को भोगने होंगे।
आज से मैं किसी का बोझ नहीं उठाऊँगी — न मानसिक, न भावनात्मक, न कर्मों का।
आज से सब मेरे लिए आत्मनिर्भर और जिम्मेदार व्यक्ति हैं।
सब चुप हो गए।
उसी दिन से घर में परिवर्तन आया। सबने अपने कर्म का दायित्व अपने ऊपर लिया।
हममें से कई, विशेषकर माताएँ, यह सोचती हैं कि हमारा कर्तव्य है सबकी चिंता करना, सबका भार उठाना। लेकिन यही मोह हमें थका देता है, और दूसरों को निर्भर बना देता है।
सच्ची करुणा तब होती है जब हम दूसरों को उनके रास्ते पर चलने दें, और आत्मबल के लिए प्रोत्साहित करें।
हम धरती पर दूसरों के जीवन की नाव खेने नहीं आए हैं, केवल उन्हें उनकी पतवार पकड़ने की प्रेरणा देने आए हैं।
