दो पहियों की रफ्तार
रात के सन्नाटे में रसोई से बर्तनों की हल्की खनक आ रही थी। रश्मि बिना आवाज़ किए बचे हुए काम निपटा रही थी। उधर अर्जुन सोफे पर बैठा मोबाइल में खोया था, पर ध्यान रश्मि की तरफ था। कुछ देर पहले दोनों के बीच बहस हुई थी — छोटी बात, लेकिन जैसे हर बार की तरह बड़ी बन गई।
रश्मि ने बिना देखे कहा, "अब ये मत कहना कि तुमने कुछ गलत नहीं कहा।"
अर्जुन ने फोन एक तरफ रखा, धीरे से उठा और रसोई में आ गया। उसने चुपचाप सिंक में कुछ बर्तन रखे और रश्मि के हाथ से कपड़ा लेकर उसे पोंछने लगा।
"क्या कर रहे हो?" रश्मि ने आँखें सिकोड़ते हुए पूछा।
"तुम थकी हो। काम तो हम दोनों ने ही किया है," अर्जुन ने बिना रुख बदले जवाब दिया।
यहीं से शुरुआत होती है बैलेंस की।
कोई भारी-भरकम संवाद नहीं, कोई बड़प्पन का दिखावा नहीं — सिर्फ इतना समझना कि हम दोनों थके हुए हैं।
अगली सुबह रश्मि ने अर्जुन के लिए टी-शर्ट आयरन करके रख दी, अर्जुन ने चुपचाप उसका पसंदीदा ब्रेकफास्ट बनाया। दोनों ने कुछ नहीं कहा, लेकिन दोनों ने बहुत कुछ समझा।
बैलेंस बनाने के लिए नियम नहीं, ध्यान चाहिए।
कौन थका है, कौन टूटा है — यह देखने की नज़ाकत चाहिए।
बहस के बाद जीतने की नहीं, थामने की कोशिश होनी चाहिए।
कभी सिर्फ सुनना होता है, जवाब देना नहीं।
कुछ बार पीछे हटना बहादुरी होती है, हार नहीं।
एक दिन अर्जुन ने कहा, "जब तू चुप रहती है, घर भी चुप हो जाता है।"
रश्मि ने मुस्कराकर जवाब दिया, "और जब तू रूठता है, छत भी भारी लगती है।"
कभी चाय की प्याली में मिल जाते हैं जवाब, कभी कपड़ों की तहों में छिप जाते हैं। साइकिल के दोनों पहिए कभी एक से नहीं होते, लेकिन घूमते एक साथ हैं — यही उनकी ताकत है।
शब्द नहीं चाहिए रिश्तों को, बस एक दूसरे की थकान समझने वाले कदम चाहिए।
और यही पहला एक्शन होता है बैलेंस का।
