लाखो पुरुष इसलिए भी जिंदगी में कुछ उखाड़ नहीं पाते
राख से उठता हुआ पुरुष
एक छोटे से कस्बे में अनिरुद्ध नाम का युवक रहता था। पढ़ाई में तेज, मेहनती और सपनों से भरा हुआ। वह चाहता था कि एक दिन बड़ा व्यापारी बने, अपने माता-पिता का नाम रोशन करे और समाज में भी उदाहरण बने। लेकिन किस्मत ने उसकी जिंदगी में एक और अध्याय जोड़ दिया—उसका विवाह।
शुरुआत में सब सामान्य लगा, पर कुछ ही समय में उसकी पत्नी संध्या का असली स्वभाव सामने आने लगा। वह अक्सर घर में कलह करती, छोटी-सी बात पर गुस्सा हो जाती, मायके जाकर महीनों तक लौटती नहीं। कभी अहंकार से भरी बातें करती, तो कभी पड़ोस या गैर पुरुषों से दिनभर हँसी-मजाक में लगी रहती। घर को स्वर्ग बनाने की बजाय वह उसे रणभूमि बना देती।
अनिरुद्ध दिन-रात यही सोचता रह जाता कि “आखिर मैं अपने सपनों के लिए समय कब निकालूँ? मेरी सारी ऊर्जा तो इन झगड़ों और कलह में नष्ट हो रही है।” धीरे-धीरे उसके व्यवसायिक सपने ठंडे पड़ने लगे। लोग कहते, “अनिरुद्ध में तो बहुत प्रतिभा थी, लेकिन बीवी ने उसकी जिंदगी बिगाड़ दी।”
कई साल यूँ ही गुजर गए। आर्थिक स्थिति डगमगा गई, माता-पिता बीमार पड़ गए, और अनिरुद्ध के चेहरे पर पहले जैसी चमक गायब हो गई। वह मानो राख बन चुका था।
लेकिन एक रात, जब वह अकेले बैठा था, उसने सोचा—“क्या मेरी जिंदगी का अंत इसी तरह होना चाहिए? क्या मैं दूसरों के स्वभाव और गलतियों के कारण अपने सपनों को जला दूँ? अगर मेरी पत्नी मुझे पीछे खींच रही है, तो क्या इसका मतलब यह है कि मैं हमेशा वहीं खड़ा रहूँ?”
उसने ठान लिया—“अब मैं अपने हालात को बदलूँगा, भले ही लोग मेरा साथ दें या नहीं।”
अनिरुद्ध ने धीरे-धीरे अपने व्यवहार को बदलना शुरू किया। वह पत्नी की बातों का जवाब देने की बजाय मौन रहने लगा। कलह को ईंधन देने की बजाय वह ध्यान अपने काम में लगाने लगा। उसने छोटे-छोटे काम से शुरुआत की—ऑनलाइन व्यापार सीखा, ग्राहकों से संबंध बनाए, और माता-पिता के आशीर्वाद के साथ दिन-रात मेहनत की।
पत्नी का स्वभाव अभी भी वही रहा, लेकिन अब वह उसे अपनी प्रगति की राह में दीवार नहीं बनने देता। उसके मन में एक ही मंत्र था—“मेरी जिंदगी की बागडोर मेरे हाथ में है, दूसरों के दोष मेरे सपनों की कब्र नहीं खोद सकते।”
कुछ सालों में ही उसका व्यवसाय जम गया। कस्बे के लोग उसे फिर से पहचानने लगे। उसके चेहरे पर आत्मविश्वास लौट आया। और तब उसने समझा कि –
👉 बहुत-से पुरुष जिंदगी में इसलिए हार जाते हैं क्योंकि वे अपने रिश्तों की उलझनों को ही सबकुछ मान लेते हैं।
👉 लेकिन जो व्यक्ति इन मुश्किल हालात से ऊपर उठकर स्वयं पर ध्यान देना सीख लेता है, वही राख से उठकर आग की तरह जलता है।
सीख:जीवन में पत्नी का अच्छा या बुरा स्वभाव निश्चित ही असर डालता है, लेकिन अंतिम निर्णय हमेशा पुरुष के अपने हौसले पर निर्भर होता है। यदि घर का माहौल नकारात्मक भी हो, तो भी इंसान अपनी ऊर्जा को सही दिशा में लगाकर खुद को सफल बना सकता है। क्योंकि अंत में, राख से भी एक नई चिंगारी जन्म ले सकती है।
लाखो पुरुष इसलिए भी जिंदगी में कुछ उखाड़ नहीं पाते, क्योंकि उनकी पत्नी या तो चरित्रहीन है या मूर्ख है या घर में कलह रखती है या गुस्सैल है या घमंडी है या अपने आप में तुर्मखा समझती है या फिर वह अपने पति को पति नहीं नौकर समझती है या मुँह फुलाकर मायके भाग जाती है या फिर गैर मर्द से सारे दिन नैन मटक्का करती है या फिर पति और सास-ससुर का जीना हराम कर देती है जिससे पुरुष इसी में उलझा रहता है और बिना कुछ किए ग़रीब और चिंता में एक दिन राख बन जाता है