आदत
* मम्मी जी के आने के बाद रसोई में सामान कम पड़ने लग गया है*. मम्मी जी कब तक आप यूं ही बैठे रहेंगे। चलिए रसोई में मेरी थोड़ी मदद करवा दीजिए। और मदद नहीं कर सकते तो कम से कम गुड्डा को ही खिला लीजिए। अब मैं अकेली खाना बनाऊं या इसे संभालू?"
आरती ने कहा।
लेकिन सास संध्या जी ने एक जवाब तक नहीं दिया।
" मम्मी जी मैं आपसे ही कह रही हूं। कम से कम जवाब तो दे दीजिए। आज खाना बनाना भी है या सबको भूखे ही रहना है"
लेकिन जब संध्या जी ने कुछ नहीं कहा तो आरती तमतमाती हुई गुड्डा को पकड़ कर अपने साथ कमरे में ले गई। कमरे में जाकर अपने पति संदीप के पास गुड्डा को जबरदस्ती बिठाते हुए बोली,
"संभालिए इसे, परेशान किये जा रही है। या तो आप इसे घुमाने के लिए पार्क में ले जाओ या फिर इसे पकड़ कर बैठो। ताकि मैं खाना बना सकूं। यहां किसी का उपवास नहीं है"
उसे इस तरह बोलता देखकर संदीप बोला,
" क्या बात है? आज इतनी गुस्से में क्यों हो? और इसकी दादी कहां गई जो तुम इसे मेरे पास लेकर आ गई हो। रोज मम्मी इसे संभाल तो लेती है"
" है तो इसी घर में। पर मुझे क्या पता क्या हुआ है तुम्हारी मम्मी को। मुंह फुला कर बैठी हुई है। बात तक नहीं कर रही। ना ही रसोई मेरी मदद करवा रही है और ना ही गुड्डा को रख रही है"
कहकर आरती गुड्डा को संदीप के पास छोड़कर रसोई में तमतमाती हुई चली गई। कुछ देर तो संदीप ने उसे संभाला और फिर उसे लेकर मां के कमरे में चला गया। देखा तो
मम्मी कोई किताब पढ़ रही थी।
" क्या बात है मम्मी, आज आप गुड्डा को नहीं संभाल रही हो। तबीयत तो ठीक है?
"
संदीप ने पूछा तो संध्या जी ने एक नजर भर उसकी तरफ देखा और दोबारा अपनी किताब में लग गई।
संदीप को उनका व्यवहार बड़ा अजीब लगा उसने दोबारा पूछा,
" मम्मी आप जवाब नहीं दे रही। कहीं नाराज तो नहीं हो?"
पर संध्या जी ने कोई जवाब नहीं दिया। संदीप भी अपना सा मुंह लेकर बाहर आ गया। और सीधा रसोई में आरती के पास जाकर बोला,
" कोई बात हुई थी क्या आज? कहीं तुमने मम्मी को कोई ऐसी वैसी बात तो नहीं कह दी, जिससे वो नाराज हो गई हो और बात नहीं कर रही हो"
" मुझे सुबह से कोई वक्त मिला है क्या ऐसी वैसी बात करने का? सुबह से मैं अकेले काम में लगी हूं। मुझे तो ऐसी कोई बात याद नहीं कि मैंने ऐसा कुछ कहा हो। और अंतर्यामी मैं हूं नहीं, जो उनके मन की बात जान जाऊं। अब मुझे डिस्टर्ब मत करो। आज खाने की भी कोई तैयारी करके नहीं रखी है मम्मी ने, तो सब कुछ मुझे ही करना है "
आरती का जवाब सुनकर संदीप गुड्डा को लेकर पार्क में रवाना होने लगा। तो आरती ने टोका,
" आते समय गरम मसाले का पैकेट लेकर आना। घर में गरम मसाला खत्म हो गया है"
" अरे तुम गरम मसाला सब्जी में डालती हो या गरम मसाले की ही सब्जी बनाती हो। अभी पंद्रह दिन पहले ही तो लेकर आया था। इतनी जल्दी कैसे खत्म हो गया? बजट का भी कुछ ध्यान रखा करो"
संदीप ने कहा।
" मैं अकेली खा गई हूं क्या गरम मसाला? पता नहीं रसोई में सामान कहां गायब होने लगा है "
आरती ने कहा।
" कहां क्या गायब होने लगा है? तुम्हारे रिश्तेदार सहेलियां आती हैं और तुम बना बनाकर खिलाता रहती हो। सारा धन तुम्हारे पास ही है। जबकि वो लोग तो इतने कंजूस है कि तुम्हें अपने घर बुलाते तक नहीं "
संदीप ने कहा।
" पहले भी तो खिलाती थी। तब तो कमी नहीं पड़ती थी। मेरे रिश्तेदार ही चुभते हैं। और मुझसे क्या पूछते हो? अपनी मम्मी से पूछो। जब से आई है तब से मेरी रसोई में से सामान गायब होने लगा है। जरूर दे आई होगी तुम्हारे छोटे भाई को। जैसे इनका भी ठेका हम ने ही ले रखा है"
" पहले कहा इतना बुलाती थी सबको। तब तो तुम्हें गुड्डा को संभालना पड़ता था। अब गुड्डा को संभालने के लिए मम्मी आ चुकी है। तो रोज किसी न किसी को बुला लेती हो। और वैसे भी मम्मी तो छोटे के घर पर भी आने को तैयार थी। लेकिन तुमने ही अपनी नाक के कारण उन्हें यहां बुलाया था। ये कहकर कि लोग क्या कहेंगे। बड़े बेटे बहू के होते हुए वो छोटे के पास रहने जा रही है "
संदीप ने कहा।
" अरे मुझे तो लगा था कि गुड्डा को संभालने के लिए कोई हो जाए..."
कहते कहते आरती चुप हो गई। जैसे उसकी पोल खुल गई हो। आरती की बात सुनकर संदीप चुपचाप वहां से गुड्डा को लेकर रवाना हो गया।
इधर संध्या जी को किचन में से बर्तनों के पटकने की आवाज
साफ-साफ सुनाई दे रही थी। जानती थी कि आरती ये सब जानबूझकर कर रही है। ताकि संध्या जी उठकर उसकी मदद कर दे। पर आज वो मन पक्का करके बैठी हुई थी कि वो कुछ भी हो जाए आरती की मदद बिल्कुल नहीं करेगी। और ना ही उसकी रसोई में जाएगी।
आखिर आरती की आदत थी सबको ये कहने की कि मम्मी जी उसकी कोई मदद नहीं करती। बल्कि वो तो चोरी चुपके से उसके घर का सामान उसके देवर देवरानी के घर दे आती है। जब से मम्मी जी यहां रहने आई है तब से उसके घर में बरकत ही नहीं रही। रसोईघर का सामान धीरे-धीरे गायब होने लगा है। सेवा हम करते हैं और वो घर देवर देवरानी का भरती है।
आखिर संध्या जी के छोटे बेटे बहू भी तो यहां से तीन घर की
दूरी पर ही थे। पर बेचारे वो लोग अपनी भाभी की आदत के कारण बेवजह बदनाम हो रहे थे। क्योंकि आते जाते हर किसी के सामने वो ये बातें बोलने लगी थी।
पर घर पर अधिकतर आते तो आखिर आरती के परिवार वाले और उसकी सहेलियां ही थी। और उन्हीं के लिए वो कुछ ना कुछ जरूर बनाती थी। कई बार तो ये होता था कि रसोई मैं उसकी छोटी बहन, भाभी या फिर उसकी सहेलियां उसके साथ काम कर रही होती थी।
अब रसोई सिर्फ एक के हाथ में हो तो कम से कम इस बात का तो रहता है कि कैसे क्या खर्च हो रहा है। इतने लोगों के हाथ में रसोई होकर के गुजरती थी तो आखिर बनाने में सामान तो उठता ही है। आखिर हर किसी का अपना तरीका होता है। लोग अपने घर को घर समझते हैं। दूसरों के घर को नहीं।
पर फिर दूसरों को बदनाम क्यों करना। ये बातें अक्सर उनके कानों तक पहुंचती थी। पर वो हमेशा यह सोचकर चुप हो जाती कि दूसरों की बातों पर क्या विश्वास करना। आरती ने उनके सामने तो नहीं कहा।
लेकिन कल रात जब वो अपनी मम्मी से फोन पर बात कर रही थी, तब भी यही बात दोहरा रही थी। जो उस समय संध्या जी को सुनाई दी गई।
बस तब से संध्या जी ठानकर बैठ गई कि अब चाहे कुछ भी हो जाए। वो आरती की रसोई में जाएगी भी नहीं। बस इसी कारण वो सुबह से किसी से बात नहीं कर रही थी। अपने कमरे में ही थी। आज उन्होंने किसी काम को हाथ तक नहीं लगाया। यहां तक कि गुड्डा को खिलाया भी नहीं।
आखिर जैसे तैसे आरती ने अकेले ही खाना तैयार किया। तब तक संदीप भी घर वापस आ गया और आते ही आरती से बोला,
" आरती फटाफट खाना ले आओ। बहुत जोर से भूख लग रही है। और अब गुड्डा को भी तुम ही संभालो। अब थक गया हूं मैं"
कहता हुआ वो हाथ मुंह धो कर डाइनिंग टेबल पर बैठ गया।
संदीप की बात सुनकर आरती बोली,
" जरा अपनी मम्मी को भी बुला लो खाना खाने के लिए। मदद तो नहीं की। कम से कम खाना तो खा ले टाइम से। ताकि मैं भी रसोई के काम से फ्री हो सकूं"
सुनकर संदीप उठकर जाने लगा तो संध्या जी बाहर निकल कर आई।
" बेटा मैं अनुज के घर जा रही हूं। वही अपना खाना खा लूंगी। वैसे मैं सुबह ही चली जाती लेकिन वह दोनों घर पर नहीं थे। अभी फोन करके पूछा है तो वो लोग आ चुके थे। छोटी ने मेरे लिए खाना बना दिया है। और कुछ दिन वही रुककर गांव रवाना हो जाऊंगी"
" पर मम्मी यहां क्या समस्या है जो अचानक आपने गांव जाने का फैसला कर लिया"
संदीप हैरान होते हुए बोला।
" बेटा तुझे नहीं पता कि क्या हो गया? बस अब मैं चोरी का इल्जाम और बर्दाश्त नहीं कर सकती। अभी तक दूसरों ने ये बात कही थी इसलिए मैंने ध्यान नहीं दिया। पर अब तो मैंने खुद ही बहू के मुंह से सुन लिया। तो अब मैं उसे बता दूं कि भगवान की कृपा से मेरे छोटे बेटे बहू के घर में भी कोई कमी नहीं है जो मैं यहां से मसाले या रसोई का सामान चुराकर उनके घर भेजूं। और वैसे भी तुम्हारी बेचारी पत्नी ने बहुत सेवा कर ली। अब बस काफी है। मेरे भी हाथ पैर अभी चल रहे हैं "
कहकर संध्या जी वहां से रवाना हो गई। संदीप और आरती में इस बात को लेकर काफी झगड़ा भी हुआ। पर आरती अपनी गलती मानने को तैयार नहीं थी।
अपने ईगो के कारण वो अभी भी इतने मेहमानों को घर पर बुलाती थी। लेकिन अब गुड्डा को संभालते हुए ये सब संभालना थोड़ा मुश्किल हो रहा था।
लेकिन जब अगले दो-तीन महीने भी यही हाल रहा, तब अपने आप आरती को समझ में आने लगा कि ये उसकी ही आदत है जिसके कारण रसोई घर में सामान कम पड़ता था। पर संदीप को किस मुंह से बोले?
इसलिए अपने आप अपनी सहेलियों और रिश्तेदारों को बुलाना कम कर दिया।