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दुल्हन तब भी होती थी दुल्हन अब भी होती हैं।


दुल्हन को लोग अब भी दुल्हन की तरह ही देखना चाहते हैं।

जब मैं कही जाती हूँ तो दुबली पतली काया वाली, लम्बी सी चोटी बनाये, बांह भर कंगन साथ चूड़ी पहने, रुनझुन बाजने वाली पायल संग बिछिया वाले आलता से रंगे पैर वाली, साड़ी में लिपटी घुघट निकाले, पति के साथ साथ या थोड़ा सा पीछे चलने वाली लड़की को देखती हूँ तो मुझे मुखड़ा देखे बिना ही अनायास ही वो बेहद खूबसूरत लगने लगती है।

ऐसा लगता है कि घूघट के पीछे की दुल्हनिया बड़े सलीके से शृंगार किये बेहद खूबसूरत होगी।

दुल्हनिया है, घूघट है मतलब बड़ी ही प्यारी सी होगी। ये एहसास ही, ये भाव ही सबसे पहले मन में आता है।

घूघट के अंदर जो मुखड़ा होता है उसकी झलक पाने की लालसा जो होती है उसे हर कोई नही समझ सकता है उसे समझने के लिए बहु होने या दुल्हन होने की महत्ता समझनी पड़ेगी, घूघट की अहमियत समझनी पड़ेगी।

आजकल की आधुनिक नारियों की दृष्टि में घूघट पिछड़ेपन या गंवारपन की निशानी बनकर रह गया है।

खुद भले ही बाहर निकलने से पहले चेहरे को धूप से बचाने के लिए स्टोल से मुँह बांधकर ऐसे निकलेगी मानों कही डाका डालने जा रही हो।

सच कहें तो जिस प्रकार टॉप के ऊपर शर्ट पहनकर और स्टोल से मुँह ढंककर आजकल की छोरिया चलती हैं ऐसे ही वेषभूषा में हमारे घर पर गेहूं काटने वाली महिलाएं आती हैं ।

दूसरों का तो पता नहीं परन्तु मैं अब भी जब कभी गांव वाली ससुराल में जाती हूँ तो पूरी तरह से दुल्हन बनकर बाकायदा घूघट निकालकर ही जाती हूं और हमेशा सर पर पल्लू रहता है जो घर से बाहर निकलने पर ठोड़ी के नीचे तक सरक आता है।

आमतौर पर मैं सब तरह के (वन पीस, शॉर्ट्स, कैप्री, स्कर्ट इत्यादि छोड़कर) कपड़े पहन लेती हूं परन्तु मैं कपड़े पहनते समय जगह, मौसम, आयोजन और अपना आराम देखकर पहनती हू।

मेरी कोशिश रहती है कि मेरे कपड़े अपने कपड़े होने की सार्थकता पूरी करे अर्थात पूरे अंग ढंके हो।

मैं आधुनिक हूँ परन्तु विचारों से और परिस्थितियों के अनुसार कपड़ो से भी मैं आधुनिक हू परंतु आधुनिक कपड़ों में भी शालीन दिखूं, ये मेरा हमेशा प्रयास रहता है । मैं अपने लिए लोगो की नजर में सम्मान व प्रशंसा चाहती हूं कुदृष्टि नही चाहती।

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