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खुद्दार बेटियां

वो सीधी सी साधारण सी मेहनती खुद्दार बेटियां,जो सारा दिन लगी रहती थी अपनो के लिए तो कभी सपनो के लिए।खिलखिलाना उन्हें बड़ा भाता है पर क्या करे ये तो बस बहुत कम इनको मिल पाता है। मेकअप से ज्यादा नहीं बनती इनकी फिर भी चमक ना जाने कहा से चेहरे पर आती है। बच्चो की जैसे मुस्कुराने वाली ..जी तोड़ कर काम करने वाली इनकी मां मुरझा ना जाएं पिता कही कमजोर ना हों जाए। छोटे भाई बहन इन्हें देख कही टूट ना जाए सारा घर संभालने वाली बच्चियां।बहुत ही नेक संस्कारों में पली बढ़ी। आज के जमाने के मॉर्डन कपडे मोबाइल घूमना इन्हें भी बहुत भाते पर पता है जितना कर पा रही है उनसे तो बस जरूरतें पूरी होती है हसरतें नहीं। पता नहीं अकड़ है या क्या ना इन्हें अब किसी की फीलिंग्स से खेलना आता हैं। ना इन्हें अपनी जरूरतों के लिए किसी से खेलना आता हैं। उसे बुरा लगेगा...वो क्या बोलेगा...इसका बिल उसकी फीस...पता नहीं कितनी चिक चिक ले कर फिरती हैं। फिर भी भगवान भरोसे विश्वास रखती हैं कि इनका भी दिन आयेगा एक दिन इनका भी आयेगा।फिर एक रोज किस्मत इन्हें आजमाती है इन्हें सपनो की दुनियां दिखा कर फिर से घुमाती है। इन्होंने नापा नहीं आंगन गांव का वही दिखाती है आसमां। बेटियां विश्वास भी नहीं कर पाती है...की सच में ये सब हो रहा है..। फिर पता नहीं तूफान सा आता है जिसमें उनका अब सब कुछ सिमट जाता है।वो उन आंधियों में खुदको खो देती है। नाराज सी किस्मत को रो देती है। अब उन्हें आसमां से डर लगता है और.. धरा पर मन नहीं लगता। उन्हें समझना शायद किसी के बस का नहीं... क्योंकि उनके मन में लहराती हरियाली अब सुख चुकी है, अंदर से टूटी बच्ची हर चीज से टूट चुकी हैं। उसे अब किसी पर विश्वास ना होता ना ही उसे कुछ रास आता। अब वो शायद खुद को खो चुकी हैं। हिम्मत नहीं बची सोचने समझने की शायद वो अब खो चुकी हैं। सहम सी जाती है बच्ची शायद जो हुआ उसमें भी खुद को ही कोसती है...खुद जलील हो कर भी बस सामने वाले को सही मान चुकी है। सबका दिल रखते रखते अपना दिल पत्थर का कर चुकी है। वो बोला करती थी सब संभाल लूंगी ये करूंगी वो करूंगी बस देखे जाओ...लेकिन वो तो खुद से रूठ चुकी है... उसे कौन समझाए अब छोटी सी गुड़िया को की उसे हर्ट करने वाले उसे शायद भूल चुके होंगे पर वो कितनी मर चुकी किसी को खबर नहीं।उसे पता नहीं अब क्या चाहिए...उसे शायद अब कुछ नहीं चाहिए।बस याद करती हैं वो टाइमअपनी वो दुनिया जिसमे वो अपने बुजुर्गों के संग बतियाती थी..अपनी मा पापा साथ खाना खाती थी, अपने छोटे भाई बहन के साथ बड़ा खिलखिलाती थी। काश ये मुकाम उसके नसीब में आता ही नहीं...काश और काश.. सिर्फ काश...

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