“माचिस और गुस्सा”
माचिस किसी दूसरी चीज
को जलने से पहले खुद को जलाती है
गुस्सा भी एक माचिस की तरह है
यह दुसरो को बर्बाद करने से पहले
खुद को बर्बाद करता है!💯
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माचिस किसी दूसरी चीज
को जलने से पहले खुद को जलाती है
गुस्सा भी एक माचिस की तरह है
यह दुसरो को बर्बाद करने से पहले
खुद को बर्बाद करता है!💯
एक छोटे शहर में काव्या नाम की लड़की रहती थी। काव्या बहुत ही साधारण शक्ल-सूरत की थी। स्कूल में कई बार लोग उसके चेहरे पर ताने कसते – “तुम हीरोइन जैसी तो नहीं दिखती, कौन तुम्हें नोटिस करेगा?”शुरुआत में काव्या इन बातों से दुखी हो जाती, लेकिन उसके पिता ने हमेशा एक बात समझाई –
"बेटा, चेहरा नहीं, इंसान के शब्द और उसका व्यवहार लोगों के दिलों पर राज करते हैं। चेहरा तो एक हादसे में भी बदल सकता है, लेकिन अच्छे बोल और सच्चे संस्कार हमेशा कायम रहते हैं।"
ये शब्द काव्या के दिल में घर कर गए।
समय बीतता गया। कॉलेज में भी वही हाल था – चमकदार लड़कियाँ हमेशा चर्चा में रहतीं, और काव्या को नज़रअंदाज़ कर दिया जाता। लेकिन एक फर्क था – जब भी किसी को परेशानी होती, सबसे पहले वे काव्या के पास ही जाते। क्योंकि उसके शब्दों में एक अजीब-सी तसल्ली…
रवि और सीमा की शादी को पाँच साल हो चुके थे। दोनों एक-दूसरे से प्यार करते थे, लेकिन रोज़मर्रा की भाग-दौड़ और जिम्मेदारियों के बीच उनका रिश्ता धीरे-धीरे शिकायतों में बदलने लगा था।
सीमा कहती – “तुम्हें ऑफिस से फुर्सत ही नहीं मिलती, मुझे वक्त ही नहीं देते।”
रवि कहता – “तुम हमेशा छोटी-छोटी बातों पर नाराज़ हो जाती हो।”
हर दिन यही खींचतान। प्यार था, लेकिन ऊपर से शिकायतों की धूल ने उसे ढक रखा था।
फिर आया संडे।सीमा सुबह-सुबह चाय बना रही थी, तभी उसने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट पढ़ी –
👉 “पति-पत्नी दोनों अक्सर एक-दूसरे की शिकायत करते हैं। आज संडे है, कुछ अलग करिए। इस पोस्ट को पढ़ने के बाद एक-दूसरे के पास जाएँ और उन्हें बताइए कि उनकी कौन सी एक आदत आपको बहुत पसंद है। वो कौन सी चीज है जिससे आपका गुस्सा प्यार में बदल जाता है? फिर देखिए दिन कैसे बदलता…
दोपहर का समय था। गर्मियों की हल्की धूप आँगन में बिखरी हुई थी। तभी बाबूजी ने मेरी ओर देखकर कहा,
"बहू, आज रात राघव घर नहीं आएगा और मैं भी अपने किसी मित्र के यहाँ जा रहा हूँ, लौटते-लौटते देर हो सकती है। मेरी चिंता मत करना। और हाँ, मेरे हिस्से का खाना मत बनाना। घर में किसी अनजान को मत घुसने देना।"
इतना कहकर वे तेज़ क़दमों से घर से बाहर निकल गए।
मैं थोड़ी उलझन में थी। कुछ तो अजीब लग रहा था… इसलिए मैंने तुरंत राघव को फोन किया, जो इन दिनों अपने मामा के यहाँ किसी काम से गया था।
"राघव, बाबूजी कह रहे थे कि तुम आज घर नहीं आओगे?" मैंने पूछा।
"हाँ यार, आज यहीं रुकना पड़ेगा। मामा का थोड़ा और काम निकल आया है। उन्होंने मुझसे रात रुकने को कहा है।"